Monday, September 26, 2011

On Europe

Rajiv Dixit on mindless following of West by Bharatiya's:
http://www.youtube.com/user/JitendraPrahri?feature=mhee

Rajiv Dixit on Geographic Prosperity of Bharat and Lachari of Europe:
http://www.youtube.com/watch?v=ixaYVN3wRI4

रूसो और कान्वेंट का सच:
http://www.youtube.com/watch?v=Rr80tQgFWug&feature=related

Tuesday, September 20, 2011

Bhagya evam Karma (http://ptbn.in/Blogcap/?p=6)

[ लेख को कर्म के अन्तःकरण चतुष्टय को ध्यान में रख कर पढो की कहा कौन क्या भूमिका निभा रहा है ]
प्रायः देखा जाता है कि कोई भी उत्पत्ति दो पदार्थों के योग से ही होती है, चाहे वह क्रिया हो, गति हो या पदार्थ हो । अतः स्वयं सिद्ध है कि परिणाम या भाग्य भी दो पदार्थों के संयोग से ही निष्पन्न होगा । जिस प्रकारपरिस्थिति + क्रिया = परिणाम .. (१) होता है उसी प्रकार परिस्थिति + कर्म = भाग्य .. (२) होता है । इस बात को और स्पष्ट करें तो कहेगें कि एक निश्चित परिस्थिति में की गई निश्चित क्रिया का परिणाम भी निश्चित होता है उसी प्रकार एक निश्चित परिस्थिति में किये गये कर्म से बनने वाला भाग्य भी निश्चित होगा ।
यहाँ परिणाम के संबंध में क्रिया और भाग्य के संबंध में कर्म शब्द का प्रयोग कुछ लोगों को भ्रमात्मक लग सकता है । किन्तु कर्म और क्रिया का अन्तर बहुत स्पष्ट है -

१. क्रिया जड़ शरीर करता है जबकि कर्म चेतन करता है ।

२. क्रियाएँ दिखाई देती हैं जबकि कर्म दिखाई नहीं देते अतः दूसरों की क्रियाओं को तो हम जान सकते हैं किन्तु कर्मों को नहीं । कर्मों को तो उनका कर्त्ता ही जान सकता है कि वह क्या कर रहा है ।

३. क्रियाँओं को देखने के लिये भौतिक इन्द्रियों की आवश्यकता होती है जबकि कर्मों को कर्मों के द्वारा ही जाना और समझा जा सकता है ।

४. क्रियाओं की सीमा होती है, क्योंकि क्रियाओं को करने वाला शरीर भी ससीम है किन्तु कर्मों की कोई सीमा नहीं होती क्योंकि कर्मों को करने वाला चेतन असीम है ।

५. क्रियाएँ कार्य हैं और कर्म कारण हैं क्योंकि क्रियाएँ कर्मों का ही प्रतिफलन होती हैं ।

६. क्रियाएँ सायास होती हैं और कर्म अनायास ।

७. मनुष्य क्रियाहीन हो सकता है किन्तु कर्महीन नहीं । क्योंकि कर्म अनवरत चलते रहते हैं, कर्म करना मनुष्य का स्वभाव है

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ (गीता ३/५)

प्राणी भी दो पदार्थों के योग का परिणाम है एक जड़ और दूसरा चेतन । शरीर जड़ है और आत्मा चेतन । इसी को शैवागमों में चिति कहा गया है । क्रिया जड़ (छon living) पदार्थों में होती है जब कि कर्म चेतन (living) में होता है । जड़ पदार्थों में अपनी कोई इच्छा या शक्ति नहीं होती अतः वह स्वयं कोई क्रिया नहीं कर सकते । चेतन के निकल जाने पर शरीर भी क्रिया हीन हो जाता है । उसका कोई अंग क्रिया नहीं कर सकता । इस चेतन के निकल जाने पर आँख होते हुए भी देखती नहीं है, कान होते हुए भी सुनते नहीं हैं, हाथ होते हुए भी हिलते नहीं हैं, पैर होते हुए भी चलते नहीं हैं ।

कर्म :
[ कर्म, क्रिया, ..]
जैसे जड़ शरीर के १-पंच तत्व, २-पंच कर्मेन्द्रियाँ, ३-पंच ज्ञानेन्द्रियाँ और ४-पंच तन्मात्राएँ; ये चार भाग होते हैं उसी प्रकार चेतना के भी चार भाग होते हैं-१-मन, २-बुद्धि, ३-चित्त और ४-अहंकार । इन्ही को अन्तःकरण चतुष्टय कहते हैं । इन चारों का जो काम है, वही कर्म है । हमारे मनोविकार, इच्छाएँ, चिन्तन, ज्ञान, चिन्तन की दिशा, और हमारी अनुभूतियाँ; ये सभी हमारे कर्म हैं जो हमारी क्रियाओं में प्रतिफलित होते हैं । यहाँ यह बताते चलें कि चेतना में अहंकार का काम अनुभव करना है, चित्त का काम अनुभव से प्राप्त ज्ञान को दिशा देना है, बुद्धि का काम उस दिशा में चिन्तन करना है, और मन का काम चिन्तन के अनुरूप इच्छाएँ करना है । इन सब के योग को ही मनोविकार कहते हैं । ये मनोविकार ही इस जड़ शरीर को क्रिया करने के लिये प्रेरित करते हैं । ये मनुष्य के कर्म ही हैं जो किसी को दिखाई नहीं देते । कर्म, क्रियाओं के प्रेरक या कारण हो सकते हैं किन्तु क्रिया और कर्म एक ही चीज़ नहीं हो सकते । यहाँ ध्यान रहे शरीर की सीमा होती है इसलिये उससे होने वाली क्रियाओं की भी सीमा होती है । किन्तु चेतना की कोई सीमा नही होती, वह असीम है, उसकी सर्वत्र गति है इसलिये उससे होने वाले कर्मों की भी कोई सीमा नहीं होती । अतः समान क्रिया के पीछे भिन्न-भिन्न कर्म हो सकते हैं । चार व्यक्ति किसी बगीचे में फूल तोड़ते हैं । यहाँ चारों की फूल तोड़ने की क्रिया समान है । किन्तु चारों की इस समान क्रिया के पीछे कारण कर्म भिन्न प्रकार के हो सकते हैं । कोई फूल प्रेमिका के गजरे में लगाने की इच्छा से तोड़ता है तो कोई भगवान पर चढ़ाने की इच्छा से तो कोई अपने सूँघने के लिये और कोई बाजार में बेचने के लिये । यहाँ चारों प्रकार के कर्म एक ही क्रिया में प्रतिफलित हो रहे हैं । अतः कह सकते हैं कि क्रियाएँ सीमित हैं और सीमित क्रियाओं में ही असीमित कर्मों को प्रतिफलित होना है । क्यों कि इस जड़ शरीर की सीमाएँ हैं जब कि चेतन की कोई सीमा नहीं होती ।
आचरण (क्रिया) की शुद्धता कर्मों की शुद्धता पर निर्भर करती है । यदि कर्म दुखात्मक होंगे तो आचरण भी दुखात्मक होगा । कर्म सुखात्मक होगें तो आचरण भी सुखात्म होगा । यदि कर्म सुख-दुःख से मुक्त होगें तो आचरण भी सुख दुःख से मुक्त होगा । सुख-दुःख से मुक्ति ही कर्म और आचरण की शुद्धता है । सुखात्मकता या दुःखात्मकता कर्म और आचरण के विकार हैं । यदि कर्म अशुद्ध होगें तो आचरण भी अशुद्ध होगा; आचरण अशुद्ध होगा तो परिणाम भी अशुद्ध होगा ।
कैसी बिडम्बना है कि मनुष्य कर्म दुःखात्मक करता है और फल सुखात्मक पाना चाहता है । बबूल बो कर आम खाना चाहता है । प्रायः लोग दुःख में आनन्द लेते हैं । सुख में उन्हें कोई आनन्द नहीं आता । अधिकांश लोग दुखात्मक बातों को सोच-सोच कर घण्टों, दिनों और महीनों दुखी होते रहते हैं किन्तु सुखात्मक बातों को सोच-सोच कर कोई-कोई ही सुखी होते हैं । यही कारण है कि अधिकांश लोग दुनिया में दुखी ही देखे जाते हैं ।
सुखी लोगों से दुखी लोगों की संख्या अधिक है । इसका एक मात्र कारण है दुखों का अधिक चिन्तन । मनुष्य स्वाभाव से सुखों का इतना चिन्तन नहीं करता । घर-परिवार में कोई दुख देने वाली बात हो जाय तो उसे बहुत समय तक सोच-सोच कर दुखी होते रहते हैं । ऐसी दुखद स्थिति में यदि कोई मित्र आकर कहे कि चलो बहुत अच्छी पिक्चर लगी है, देख आयँ, तो दुखी व्यक्ति कहता है कि तुम चले जाओ मेरा दिमाग़ ठीक नहीं है । कभी सोचें कि हम उस मित्र के साथ पिक्चर क्यों नहीं जाते ? स्पष्ट रूप से यदि हम पिक्चर जायँगे तो हमारा उस दुखद बात पर से ध्यान हट जायेगा और ध्यान हट जायगा तो सोचना बन्द हो जायगा । सोचना बन्द हो जायगा तो दुखी होना बन्द हो जायगा । जबकि दुखी होने में हमें इतना मज़ा आ रहा होता है कि हम उसे छोड़ कर जाना नहीं चाहते । किन्तु ऐसा सुखात्मक बात होने पर नहीं होता । जब कोई सुखात्मक बात होती है तब सोचते हैं कि यह तो होना ही था, ये हमारा अधिकार था, किसी ने ये सुख दिया तो यह उसका कर्त्तव्य था । बस ! क्या कभी ऐसा होता है कि सुखद बात को सोच-सोच कर हमें रात भर नींद न आयी हो ? सुखद बातों में हमैं सुखी होने की आदत ही नहीं है । फिर भी हम सुखी होने के लिये तत्पर रहते हैं । मनुष्य कर्म कुछ और कर रहा है तथा चाहता कुछ और है । यही जीवन की विडम्बना है ।

मेरा विचार : बुद्धि इन चारो में सर्वोपरि है क्योकि ये आत्मा के निकट है| संस्कार चित्त की पृष्ठ भूमि हैं, चित्त मन की पृष्ठ भूमि है| परन्तु बुद्धि की सत्ता से चित्त को परिवर्तित किया जा सकता है| विवेक बुद्धि का गुण है|

बीज :
[ कारण शरीर, संस्कार, भूतपूर्व कर्मों की परिणिति]
मनुष्य कभी कर्म विहीन नहीं रह सकता । कर्म करना मनुष्य का स्वभाव है । मनुष्य जब तक कर्मों का फल नहीं भोग लेता ये कर्म समाप्त नहीं होते, संचित होते रहते हैं । ये संचित कर्म मृत्यु के बाद भी जीव (कारण शरीर जिसमें आत्मा कैद है) का पीछा नहीं छोड़ते उसके साथ जाते हैं । कर्मों से कभी छुटकारा नहीं है । पूर्व जन्म के संचित कर्मों को लेकर ही जीव जन्म लेता है । ये कर्म जीव के साथ बीज रूप में रहते हैं । बीज जैसे उचित परिस्थितियाँ मिलने पर अंकुरित होता है वैसे ही यह संचित कर्म भी अंकुरित, पल्लवित और फलित होता है । कुछ विद्वान बीज रूप में मनुष्य के भीतर रहने वाले इन कर्मों को संस्कार (जो संचितकर्म बार-बार पुष्ट हो कर हमारे <क्रियमाण कर्मों को दिशा देने में सक्षम हो जाते हैं>) भी कहते हैं । ये संचित कर्म या भाग्य या इनको जो भी कहा जाय, अपने अनुकूल परिस्थितियाँ मिलने पर जब फलित होते हैं <तो पुनः नये कर्मों को जन्म देते हैं> । जैसे बीज से फल और फल से बीज वैसे ही कर्म से भाग्य <और भाग्य से कर्म> । यह श्रंखला अनवरत चलती रहती है ।

मेरा विचार : बीज, (संभवतः बाह्य अथवा ज्योतिष) परिस्थितियां पा कर फलित होने लगते हैं| तद्पश्चात ये स्वयं परिस्थितियों का निर्माण करते हैं| ऐसे में कर्म भाग्य को नियंत्रित करता है (समीकरण २)|

परिस्थिति :
[अन्तः एवं बाह्य (मुख्यतः ज्योतिष)]
[ सुधार की जरूरत है ]

कर्म से परे (अलग या बाहर) की विभिन्न स्थितियों का ही नाम परिस्थितियाँ है । ये बाह्य कारणों से भी बन सकती हैं और अन्तः कारणों से भी । बाह्य कारणों में ज्योतिष (उन पिण्डों को कहते हैं जिनमें ज्योति होती है जैसे ग्रह, नक्षत्र, राशि आदि) एक मुख्य और प्रबल कारण है । अन्तः कारणों में हमारा कर्म ही कारण होता है । परिस्थितियाँ बदलती रह सकती हैं । कर्म को प्रभावित कर सकती हैं । परिस्थितियों पर भले ही हमारा वश न हो । हम उनके प्रभावों से अपने कर्मों के द्वारा बच सकते हैं । जैसे वर्षा में हम वर्षा को तो नहीं रोक सकते किन्तु छाता, बरसाती, मोमजामा आदि के बारे में सोच कर और उनका प्रयोग कर के भीगने से बच सकते हैं । यहाँ भीगने से बचने का एकमात्र कारण हमारा क्रियमाण कर्म ही है । ये परिस्थितियाँ ही हैं जो कर्म से मिल कर भाग्य को निष्पन्न करती हैं । इन दोनों की रासायनिक प्रक्रिया से कर्म ही भाग्य में परिवर्तित होता है । कदाचित् इसीलिये संचित कर्मों को प्रारब्ध कर्म२ भी कहते हैं और कोई कोई तो इस प्रारब्ध को ही भाग्य समझ लेते हैं । ज्योतिष शास्त्र के द्वारा परिस्थितियों का ही अध्ययन किया जा सकता है, भाग्य का नहीं । भाग्य तो परिस्थितियों के अतिरिक्त कर्म पर अधिक निर्भर करता है । ज्योतिष के जातक शास्त्र का आधार ग्रहों के साथ-साथ कर्म फल का सिद्धान्त भी है । किसी के कर्मों को समझे बिना ज्योतिष शास्त्र द्वारा ठीक-ठीक भविष्यवाणी करना संभव नहीं है । ज्योतिष में मेरा अनुभव है कि दो जुड़वाँ बच्चों की कुण्डली एक सी होती है किन्तु भाग्य एक से नहीं होते । क्योंकि दोनों के कर्म एक से नहीं होते । इसीलिये महर्षि पराशर ने मैत्रेय के प्रश्न के उत्तर में एक ज्योतिषी के लिये गणितज्ञ होने के साथ-साथ कवि होना भी गुण माना है । कवि का अर्थ केवल कविता लिखने वाला नहीं है । आचार्य यास्क के अनुसार कवयः क्रान्ति दर्शिनः । वैद्यों और काव्य रचना कर्ताओं को इसी अर्थ में कवि कहा जाता है कि वे, जो किसी को नहीं दिखाई देते उन कर्मों और रोग के कारणों को जानने की क्षमता रखते हैं । ये जानना ही क्रान्ति दर्शन है । मन के भावों, विचारों, इच्छाओं और अनुभूतियों को, उनमें होने वाले परिवर्तनों को जानने वाला ही कवि अस्तु ज्योतिषी होता है ।
[मेरा विचार : संचित बीज रूपी संस्कार स्वरुप भूतकालीन] कर्म को परिणाम तक पहुँचाने वाली परिस्थितियाँ [मेरा विचार : बाह्य] होती हैं । इन परिस्थितियों का कारण ये आकाशीय पिण्ड या ज्योतिष ही होते हैं । []परिस्थिति और []कर्म के संयोग से परिणाम तक पहुँचने में जो समय या काल लगता है वह काल भी इन्ही का परिणाम है [इसे विचारना है] । जिस प्रकार अन्न के बीजों को फलित करने वाली परिस्थितियों के रूप में रात-दिन और मौसम आदि एक ज्योतिष (आकाशीय पिण्ड-सूर्य ) से ही बनते हैं । उसी प्रकार अन्य तारे, नक्षत्र, राशि और ग्रहादि से, सभी प्रकार के कर्मों को परिणाम तक पहुँचाने वाली विभिन्न परिस्थितियाँ बनती हैं । ज्योतिष के जातक शास्त्र या फलित ज्योतिष का काम है कि ग्रहादि के द्वारा बनने वाली परिस्थितियों की सूचना दे । जिसके आधार पर कर्मों के संयोग से बनने वाले भाग्य की सूचना प्राप्त की जा सके । क्यों कि एक निश्चित परिस्थिति में किये गये निश्चित कर्म का परिणाम (भाग्य) भी निश्चित ही होता है ।

भाग्य को बदला नहीं जा सकता । हाँ कर्म बदले जा सकते हैं । कर्म बदलने से भाग्य भी बदल जाता है । इसीलिये कहा जाता है कि भाग्य मनुष्य की मुट्ठी में होता है । चूँकि कर्मों का कर्त्ता मनुष्य ही हैं और कर्म ही परिस्थितियों से मिल कर भाग्य बनते हैं अतः भाग्य का कर्त्ता भी मनुष्य ही है । कोई मनुष्य सीधे भाग्य को नहीं बदल सकता, उसे पहले कर्म बदलने पडेगें । परिस्थितियाँ प्रायः उसके वश में नहीं हैं क्योंकि भले ही वे किसी भी कारण से बनी हों, बनने के बाद बदली नहीं जा सकतीं और न नष्ट ही की जा सकती हैं । अतः कह सकते हैं कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्मों में ही है, परिस्थिति या फल में नहीं । इसीलिये गीता में भगवान कृष्ण ने कहा कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । तेरा अधिकार कर्मों में (एव) ही हैं; फलों में तो कभी नहीं ।

Thursday, September 1, 2011

Hindu downfall

1378 मे ईरान भारत से अलग हुआ - इस्लामिक देश बना 1761 मे अफगानिस्तान भारत से अलग हुआ - इस्लामिक देश बना 1947 मे पाकिस्तान भारत से अलग हुआ इस्लामिक देश बना 1952 मे आजाद कश्मीर बना, भारत से अलग हुआ इस्लामिक देश बना 1971 मे बांग्लादेश भारत से अलग हुआ, इस्लामिक देश बना हम अगर हिन्दू को जगाने की बाते करेंगे तो आरएसएस का और वीएचपी का एजेंट बताया जाता है. अभी भी समय है, और धर्म निरपेक्षता का मतलब अगर हिन्दू नहीं तो हिन्दू-विरोधी भी नहीं| But Hindus are not aware of it. That is bad. This piece of information makes difference. It has to be popularized. It is no way a hate speech. I am merely stating the truth. It may look anti-Islamic but logically it is not as it contains untainted neutral fact. Islam has to accept the truth even if it is dirty on their part. Not following that will be their unjust and cannot be helped. Give me 'Why', if you see my argument wrong. Remember, Hinduism doesn't mean Anti-Islam inherently from social perspective until unless Muslim want to take it that way. And there is nothing wrong in asking fellow Hindus to be awaken. In fact that must happen.