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अरब की प्राचीन समृद्ध वैदिक संस्कृति और भारत
अरब देश का भारत, भृगु के पुत्र शुक्राचार्य तथा उनके पोत्र और्व से
ऐतिहासिक संबंध प्रमाणित है, यहाँ तक कि "हिस्ट्री ऑफ पर्शिया" के लेखक
साइक्स का मत है कि अरब का नाम और्व के ही नाम पर पड़ा, जो विकृत होकर
"अरब" हो गया। भारत के उत्तर-पश्चिम में इलावर्त था, जहाँ दैत्य और दानव
बसते थे, इस इलावर्त में एशियाई रूस का दक्षिणी-पश्चिमी भाग, ईरान का
पूर्वी भाग तथा गिलगित का निकटवर्ती क्षेत्र सम्मिलित था। आदित्यों का
आवास स्थान-देवलोक भारत के उत्तर-पूर्व में स्थित हिमालयी क्षेत्रों में
रहा था। बेबीलोन की प्राचीन गुफाओं में पुरातात्त्विक खोज में जो भित्ति
चित्र मिले है, उनमें विष्णु को हिरण्यकशिपु के भाई हिरण्याक्ष से युद्ध
करते हुए उत्कीर्ण किया गया है।
उस युग में अरब एक बड़ा व्यापारिक केन्द्र रहा था, इसी कारण देवों, दानवों
और दैत्यों में इलावर्त के विभाजन को लेकर 12 बार युद्ध 'देवासुर
संग्राम' हुए। देवताओं के राजा इन्द्र ने अपनी पुत्री ज्यन्ती का विवाह
शुक्र के साथ इसी विचार से किया था कि शुक्र उनके (देवों के) पक्षधर बन
जायें, किन्तु शुक्र दैत्यों के ही गुरू बने रहे। यहाँ तक कि जब दैत्यराज
बलि ने शुक्राचार्य का कहना न माना, तो वे उसे त्याग कर अपने पौत्र और्व
के पास अरब में आ गये और वहाँ 10 वर्ष रहे। साइक्स ने अपने इतिहास ग्रन्थ
"हिस्ट्री ऑफ पर्शिया" में लिखा है कि 'शुक्राचार्य लिव्ड टेन इयर्स इन
अरब'। अरब में शुक्राचार्य का इतना मान-सम्मान हुआ कि आज जिसे 'काबा'
कहते है, वह वस्तुतः 'काव्य शुक्र' (शुक्राचार्य) के सम्मान में निर्मित
उनके आराध्य भगवान शिव का ही मन्दिर है। कालांतर में 'काव्य' नाम विकृत
होकर 'काबा' प्रचलित हुआ। अरबी भाषा में 'शुक्र' का अर्थ 'बड़ा' अर्थात
'जुम्मा' इसी कारण किया गया और इसी से 'जुम्मा' (शुक्रवार) को मुसलमान
पवित्र दिन मानते है।
"बृहस्पति देवानां पुरोहित आसीत्, उशना काव्योऽसुराणाम्"-जैमिनिय ब्रा.
(01-125)
अर्थात बृहस्पति देवों के पुरोहित थे और उशना काव्य (शुक्राचार्य) असुरों
के।
प्राचीन अरबी काव्य संग्रह गंथ 'सेअरूल-ओकुल' के 257वें पृष्ठ पर हजरत
मोहम्मद से 2300 वर्ष पूर्व एवं ईसा मसीह से 1800 वर्ष पूर्व पैदा हुए
लबी-बिन-ए-अरव्तब-बिन-ए-तुरफा ने अपनी सुप्रसिद्ध कविता में भारत भूमि
एवं वेदों को जो सम्मान दिया है, वह इस प्रकार है-
"अया मुबारेकल अरज मुशैये नोंहा मिनार हिंदे।
व अरादकल्लाह मज्जोनज्जे जिकरतुन।1।
वह लवज्जलीयतुन ऐनाने सहबी अरवे अतुन जिकरा।
वहाजेही योनज्जेलुर्ररसूल मिनल हिंदतुन।2।
यकूलूनल्लाहः या अहलल अरज आलमीन फुल्लहुम।
फत्तेबेऊ जिकरतुल वेद हुक्कुन मालन योनज्वेलतुन।3।
वहोबा आलमुस्साम वल यजुरमिनल्लाहे तनजीलन।
फऐ नोमा या अरवीयो मुत्तवअन योवसीरीयोनजातुन।4।
जइसनैन हुमारिक अतर नासेहीन का-अ-खुबातुन।
व असनात अलाऊढ़न व होवा मश-ए-रतुन।5।"
अर्थात-(1) हे भारत की पुण्यभूमि (मिनार हिंदे) तू धन्य है, क्योंकि
ईश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझको चुना। (2) वह ईश्वर का ज्ञान प्रकाश,
जो चार प्रकाश स्तम्भों के सदृश्य सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, यह
भारतवर्ष (हिंद तुन) में ऋषियों द्वारा चार रूप में प्रकट हुआ। (3) और
परमात्मा समस्त संसार के मनुष्यों को आज्ञा देता है कि वेद, जो मेरे
ज्ञान है, इनके अनुसार आचरण करो।(4) वह ज्ञान के भण्डार साम और यजुर है,
जो ईश्वर ने प्रदान किये। इसलिए, हे मेरे भाइयों! इनको मानो, क्योंकि ये
हमें मोक्ष का मार्ग बताते है।(5) और दो उनमें से रिक्, अतर (ऋग्वेद,
अथर्ववेद) जो हमें भ्रातृत्व की शिक्षा देते है, और जो इनकी शरण में आ
गया, वह कभी अन्धकार को प्राप्त नहीं होता।
इस्लाम मजहब के प्रवर्तक मोहम्मद स्वयं भी वैदिक परिवार में हिन्दू के
रूप में जन्में थे, और जब उन्होंने अपने हिन्दू परिवार की परम्परा और वंश
से संबंध तोड़ने और स्वयं को पैगम्बर घोषित करना निश्चित किया, तब संयुक्त
हिन्दू परिवार छिन्न-भिन्न हो गया और काबा में स्थित महाकाय शिवलिंग
(संगे अस्वद) के रक्षार्थ हुए युद्ध में पैगम्बर मोहम्मद के चाचा उमर-बिन-
ए-हश्शाम को भी अपने प्राण गंवाने पड़े। उमर-बिन-ए-हश्शाम का अरब में एवं
केन्द्र काबा (मक्का) में इतना अधिक सम्मान होता था कि सम्पूर्ण अरबी
समाज, जो कि भगवान शिव के भक्त थे एवं वेदों के उत्सुक गायक तथा हिन्दू
देवी-देवताओं के अनन्य उपासक थे, उन्हें अबुल हाकम अर्थात 'ज्ञान का
पिता' कहते थे। बाद में मोहम्मद के नये सम्प्रदाय ने उन्हें ईष्यावश अबुल
जिहाल 'अज्ञान का पिता' कहकर उनकी निन्दा की।
जब मोहम्मद ने मक्का पर आक्रमण किया, उस समय वहाँ बृहस्पति, मंगल,
अश्विनी कुमार, गरूड़, नृसिंह की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित थी। साथ ही एक
मूर्ति वहाँ विश्वविजेता महाराजा बलि की भी थी, और दानी होने की
प्रसिद्धि से उसका एक हाथ सोने का बना था। 'Holul' के नाम से अभिहित यह
मूर्ति वहाँ इब्राहम और इस्माइल की मूर्त्तियो के बराबर रखी थी। मोहम्मद
ने उन सब मूर्त्तियों को तोड़कर वहाँ बने कुएँ में फेंक दिया, किन्तु तोड़े
गये शिवलिंग का एक टुकडा आज भी काबा में सम्मानपूर्वक न केवल प्रतिष्ठित
है, वरन् हज करने जाने वाले मुसलमान उस काले (अश्वेत) प्रस्तर खण्ड
अर्थात 'संगे अस्वद' को आदर मान देते हुए चूमते है।
प्राचीन अरबों ने सिन्ध को सिन्ध ही कहा तथा भारतवर्ष के अन्य प्रदेशों
को हिन्द निश्चित किया। सिन्ध से हिन्द होने की बात बहुत ही अवैज्ञानिक
है। इस्लाम मत के प्रवर्तक मोहम्मद के पैदा होने से 2300 वर्ष पूर्व यानि
लगभग 1800 ईश्वी पूर्व भी अरब में हिंद एवं हिंदू शब्द का व्यवहार ज्यों
का त्यों आज ही के अर्थ में प्रयुक्त होता था।
अरब की प्राचीन समृद्ध संस्कृति वैदिक थी तथा उस समय ज्ञान-विज्ञान, कला-
कौशल, धर्म-संस्कृति आदि में भारत (हिंद) के साथ उसके प्रगाढ़ संबंध थे।
हिंद नाम अरबों को इतना प्यारा लगा कि उन्होंने उस देश के नाम पर अपनी
स्त्रियों एवं बच्चों के नाम भी हिंद पर रखे।
अरबी काव्य संग्रह ग्रंथ ' सेअरूल-ओकुल' के 253वें पृष्ठ पर हजरत मोहम्मद
के चाचा उमर-बिन-ए-हश्शाम की कविता है जिसमें उन्होंने हिन्दे यौमन एवं
गबुल हिन्दू का प्रयोग बड़े आदर से किया है । 'उमर-बिन-ए-हश्शाम' की कविता
नयी दिल्ली स्थित मन्दिर मार्ग पर श्री लक्ष्मीनारायण मन्दिर (बिड़ला
मन्दिर) की वाटिका में यज्ञशाला के लाल पत्थर के स्तम्भ (खम्बे) पर काली
स्याही से लिखी हुई है, जो इस प्रकार है -
" कफविनक जिकरा मिन उलुमिन तब असेक ।
कलुवन अमातातुल हवा व तजक्करू ।1।
न तज खेरोहा उड़न एललवदए लिलवरा ।
वलुकएने जातल्लाहे औम असेरू ।2।
व अहालोलहा अजहू अरानीमन महादेव ओ ।
मनोजेल इलमुद्दीन मीनहुम व सयत्तरू ।3।
व सहबी वे याम फीम कामिल हिन्दे यौमन ।
व यकुलून न लातहजन फइन्नक तवज्जरू ।4।
मअस्सयरे अरव्लाकन हसनन कुल्लहूम ।
नजुमुन अजा अत सुम्मा गबुल हिन्दू ।5।
अर्थात् - (1) वह मनुष्य, जिसने सारा जीवन पाप व अधर्म में बिताया हो,
काम, क्रोध में अपने यौवन को नष्ट किया हो। (2) अदि अन्त में उसको
पश्चाताप हो और भलाई की ओर लौटना चाहे, तो क्या उसका कल्याण हो सकता है ?
(3) एक बार भी सच्चे हृदय से वह महादेव जी की पूजा करे, तो धर्म-मार्ग
में उच्च से उच्च पद को पा सकता है। (4) हे प्रभु ! मेरा समस्त जीवन लेकर
केवल एक दिन भारत (हिंद) के निवास का दे दो, क्योंकि वहाँ पहुँचकर मनुष्य
जीवन-मुक्त हो जाता है। (5) वहाँ की यात्रा से सारे शुभ कर्मो की
प्राप्ति होती है, और आदर्श गुरूजनों (गबुल हिन्दू) का सत्संग मिलता है ।
- विश्वजीत सिंह 'अनंत'
Friday, March 16, 2012
Thursday, March 15, 2012
वायु से बढ़ाएँ आयु
कछुए की साँस लेने और छोड़ने की गति इनसानों से कहीं अधिक दीर्घ है। व्हेल मछली की उम्र का राज भी यही है। बड़ और पीपल के वृक्ष की आयु का राज भी यही है। वायु को योग में प्राण कहते हैं। प्राचीन ऋषि वायु के इस रहस्य को समझते थे तभी तो वे कुंभक लगाकर हिमालय की गुफा में वर्षों तक बैठे रहते थे। श्वास को लेने और छोड़ने के दरमियान घंटों का समय प्राणायाम के अभ्यास से ही संभव हो पाता है।
...
शरीर में दूषित वायु के होने की स्थिति में भी उम्र क्षीण होती है और रोगों की उत्पत्ति होती है। पेट में पड़ा भोजन दूषित हो जाता है, जल भी दूषित हो जाता है तो फिर वायु क्यों नहीं। यदि आप लगातार दूषित वायु ही ग्रहण कर रहे हैं तो समझो कि समय से पहले ही रोग और मौत के निकट जा रहे हैं।
असंयमित श्वास के कारण - बाल्यावस्था से ही व्यक्ति असावधानीपूर्ण और अराजक श्वास लेने और छोड़ने की आदत के कारण ही अनेक मनोभावों से ग्रसित हो जाता है। जब श्वास चंचल और अराजक होगी तो चित्त के भी अराजक होने से आयु का भी क्षय शीघ्रता से होता रहता है।
फिर व्यक्ति जैसे-जैसे बड़ा होता है काम, क्रोध, मद, लोभ, व्यसन, चिंता, व्यग्रता, नकारात्मता और भावुकता के रोग से ग्रस्त होता जाता है। उक्त रोग व्यक्ति की श्वास को पूरी तरह तोड़कर शरीर स्थित वायु को दूषित करते जाते हैं जिसके कारण शरीर का शीघ्रता से क्षय होने लगता है।
कुंभक का अभ्यास करें - हठयोगियों ने विचार किया कि यदि सावधानी से धीरे-धीरे श्वास लेने व छोड़ने और बाद में रोकने का भी अभ्यास बनाया जाए तो परिणामस्वरूप चित्त में स्थिरता आएगी।
श्वसन-क्रिया जितनी मंद और सूक्ष्म होगी उतना ही मंद जीवन क्रिया के क्षय होने का क्रम होगा। यही कारण है कि श्वास-प्रश्वास का नियंत्रण करने तथा पर्याप्त समय तक उसको रोक रखने (कुंभक) से आयु के भी बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है। इसी कारण योग में कुंभक या प्राणायाम का सर्वाधिक महत्व माना गया है।
सावधानी- आंतरिक कुंभक अर्थात श्वास को अंदर खींचकर पेट या अन्य स्थान में रोककर रखने से पूर्व शरीरस्थ नाड़ियों में स्थित दूषित वायु को निकालने के लिए बाहरी कुंभक का अभ्यास करना आवश्यक है। अतः सभी नाड़ियों सहित शरीर की शुद्धि के बाद ही कुंभक का अभ्यास करना चाहिए।
वैसे तो प्राणायाम अनुलोम-विलोम के भी नाड़ियों की शुद्धि होकर शरीर शुद्ध होता है और साथ-साथ अनेक प्रकार के रोग भी दूर होते हैं, किन्तु किसी प्रकार की गलती इस अभ्यास में हुई तो अनेक प्रकार के रोगों के उत्पन्न होने की संभावना भी रहती है। अतः उचित रीति से ही प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए।
प्राणायाम का रहस्य - इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना ये तीन नाड़ियाँ प्रमुख हैं। प्राणायम के लगातार अभ्यास से ये नाड़ियाँ शुद्ध होकर जब सक्रिय होती हैं तो व्यक्ति के शरीर में किसी भी प्रकार का रोग नहीं होता और आयु प्रबल हो जाती है। मन में किसी भी प्रकार की चंचलता नहीं रहने से स्थिर मन शक्तिशाली होकर धारणा सिद्ध हो जाती है अर्थात ऐसे व्यक्ति की सोच फलित हो जाती है। यदि लगातार इसका अभ्यास बढ़ता रहा तो व्यक्ति सिद्ध हो जाता है।
...
शरीर में दूषित वायु के होने की स्थिति में भी उम्र क्षीण होती है और रोगों की उत्पत्ति होती है। पेट में पड़ा भोजन दूषित हो जाता है, जल भी दूषित हो जाता है तो फिर वायु क्यों नहीं। यदि आप लगातार दूषित वायु ही ग्रहण कर रहे हैं तो समझो कि समय से पहले ही रोग और मौत के निकट जा रहे हैं।
असंयमित श्वास के कारण - बाल्यावस्था से ही व्यक्ति असावधानीपूर्ण और अराजक श्वास लेने और छोड़ने की आदत के कारण ही अनेक मनोभावों से ग्रसित हो जाता है। जब श्वास चंचल और अराजक होगी तो चित्त के भी अराजक होने से आयु का भी क्षय शीघ्रता से होता रहता है।
फिर व्यक्ति जैसे-जैसे बड़ा होता है काम, क्रोध, मद, लोभ, व्यसन, चिंता, व्यग्रता, नकारात्मता और भावुकता के रोग से ग्रस्त होता जाता है। उक्त रोग व्यक्ति की श्वास को पूरी तरह तोड़कर शरीर स्थित वायु को दूषित करते जाते हैं जिसके कारण शरीर का शीघ्रता से क्षय होने लगता है।
कुंभक का अभ्यास करें - हठयोगियों ने विचार किया कि यदि सावधानी से धीरे-धीरे श्वास लेने व छोड़ने और बाद में रोकने का भी अभ्यास बनाया जाए तो परिणामस्वरूप चित्त में स्थिरता आएगी।
श्वसन-क्रिया जितनी मंद और सूक्ष्म होगी उतना ही मंद जीवन क्रिया के क्षय होने का क्रम होगा। यही कारण है कि श्वास-प्रश्वास का नियंत्रण करने तथा पर्याप्त समय तक उसको रोक रखने (कुंभक) से आयु के भी बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है। इसी कारण योग में कुंभक या प्राणायाम का सर्वाधिक महत्व माना गया है।
सावधानी- आंतरिक कुंभक अर्थात श्वास को अंदर खींचकर पेट या अन्य स्थान में रोककर रखने से पूर्व शरीरस्थ नाड़ियों में स्थित दूषित वायु को निकालने के लिए बाहरी कुंभक का अभ्यास करना आवश्यक है। अतः सभी नाड़ियों सहित शरीर की शुद्धि के बाद ही कुंभक का अभ्यास करना चाहिए।
वैसे तो प्राणायाम अनुलोम-विलोम के भी नाड़ियों की शुद्धि होकर शरीर शुद्ध होता है और साथ-साथ अनेक प्रकार के रोग भी दूर होते हैं, किन्तु किसी प्रकार की गलती इस अभ्यास में हुई तो अनेक प्रकार के रोगों के उत्पन्न होने की संभावना भी रहती है। अतः उचित रीति से ही प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए।
प्राणायाम का रहस्य - इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना ये तीन नाड़ियाँ प्रमुख हैं। प्राणायम के लगातार अभ्यास से ये नाड़ियाँ शुद्ध होकर जब सक्रिय होती हैं तो व्यक्ति के शरीर में किसी भी प्रकार का रोग नहीं होता और आयु प्रबल हो जाती है। मन में किसी भी प्रकार की चंचलता नहीं रहने से स्थिर मन शक्तिशाली होकर धारणा सिद्ध हो जाती है अर्थात ऐसे व्यक्ति की सोच फलित हो जाती है। यदि लगातार इसका अभ्यास बढ़ता रहा तो व्यक्ति सिद्ध हो जाता है।
Wednesday, March 14, 2012
भारतीय बहुधर्मीय समरसता
बहुधर्मीय समरसता का मंत्र
भारत में धार्मिक बहुवाद की परंपरा बडी प्राचीन है। प्राचीनकाल से ही अनेक धर्म और उनके अनुयायी इस भूमि पर फल-फूल रहे हैं और समय के साथ उनमें जो सामंजस्य और सहिष्णुता निर्मित हुई है उसीके कारण उनकी विविधताओं में एकता के जो दर्शन होते हैं वैसे दर्शन कहीं और होना अत्यंत दुर्लभ है। इस भारतीय धर्म-धारणा और उनके दर्शन की विविधाताओं में जिस एकता के दर्शन होते हैं उसका अनुपमेय उदाहरण है शिव-परिवार। इस परिवार के प्रत्येक सदस्य के वाहन, विन्यास, प्रतीक और क्रिया-कलापों में एकतरफ तो विषमता है तो दूसरी तरफ अद्भूत एकात्मता का सुंदर परिचय प्राप्त होता है।
शिव के बारह ज्योतिर्लिगों में भारत की अखंडता के दर्शन होते हैं। जो उन्हें आदि-देव का रुप प्रदान करते हैं और पत्नी पार्वती को जगतमाताका। उनके बडे पुत्र कार्तिकेय के पास हिंदुओं द्वारा पूजे जानेवाले सभी देवताओं का सेनापतित्व है तो, दूसरे पुत्र गणेश उन सभी देवताओं में सर्वप्रथम पूज्य हैं। लेकिन स्वयं शिव स्मशान विहारी हैं। कार्तिकेय या कार्तिकस्वामी को दक्षिण भारत में सुब्रहमण्यम, मुरुगन, षणमुखम आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है। उत्तर भारत में इन्हें ब्रह्मचारी तो, दक्षिण भारत में इनकी दो पत्नियां होना माना जाता है। पहली इंद्रपुत्री देवयानी (जिसके कारण कार्तिकेय को दैवयानैमणालन कहा जाता है) कार्तिकेय से देवयानी का विवाह हो इसकी इच्छा स्वयं इंद्र ने महाविष्णु, ब्रह्मा आदि के समक्ष प्रकट की थी। जिसका सभी देवताओं ने स्वागत किया था। तो, दूसरी पत्नी वल्ली (जिसके पति होने के कारण उन्हें वल्लीमणालन भी कहा जाता है) यह पूर्व जन्म में भगवान विष्णु की पुत्री थी। इन विवाहों के वर्णन का कथानक दुर्गादास स्वामी के संक्षिप्त तमिल स्कंद पुराण में मिलता है। ठीक इसी तरह जहां गणेशजी को उत्तर भारत में विवाहित तो दक्षिण भारत में ब्रह्मचारी माना जाता है। इसी प्रकार से इनके आसपास के वातावरण को देखें तो हमें दिखाई देगा कि शिवजी गले में सर्प है जिसका शत्रु मोर है जो कार्तिकेयजी का वाहन है और गणेशजी का वाहन चूहा है जिसका शत्रु सांप है चूहा सांप का भोजन भी है। फिर भी ये सब एक साथ एक ही जगह सुख-शांति से सहअस्तित्व को स्वीकारते हुए रह रहे हैं।
शिव के भक्त शैव तो उनके विपरीत गुणधर्म वाले विष्णु के भक्त वैष्णव कहलाते हैं। इन दो प्रमुख संप्रदायों की एकता का प्रतीक है उज्जैन की हरिहर यात्रा तो दक्षिण भारत में हर और हरि के संयुक्त प्रतीक के रुप में स्वामी अयप्पा की पूजा का प्रचलन। इसी तरह से तीन प्रमुख देवताओं ब्रह्मा, विष्णु, महेश जिनमें ब्रह्माजी निर्माणकर्ता, भगवान विष्णु पालनहार तो शिवजी संहार के देवता होने के बावजूद इनके संयुक्त प्रतीक के रुप में भगवान दत्तात्रय की पूजा की जाती है। जो हमारी व्यापक सोच-सामंजस्य, सहिष्णुता के साथ ही एकता में अनेकता को स्वीकारने की प्रवृत्ति को दर्शाती है। शिवजी भोलेभंडारी तो भगवान विष्णु चतुर मायावी जिन्होंने शिवजी द्वारा भोलेपन में भस्मासुर को दिए वरदान से जिसके कारण उनके प्राण संकट में आ गए थे की रक्षा के लिए मोहिनी रुप धारण कर भस्मासुर से उनकी रक्षा की। न केवल इनके कार्य परस्पर विरोधी हैं अपितु शिवजी जो गले में सर्प को धारण किए रहते हैं का शत्रु गरुड है जो विष्णुजी का वाहन है और ब्रह्माजी का आसन कमल पुष्प है जो अति कोमल होता है। इन्हीं ब्रह्माजी के पुत्र हैं नारदमुनि जो भगवान विष्णु के भक्त होकर तीनो लोकों में विहार करते हैं और इन तीनों के संपर्क सूत्र का कार्य भी निभाहते हैं। इन तीनों का सामंजस्य देखिए कि जब ब्रह्माजी रावण की भक्ति से प्रसन्न हो उसे अमरत्व का वरदान दे बैठे तो उसके नाश के लिए विष्णुजी ने भगवान राम का अवतार लिया तो उनके सेवक के रुप में भगवान शिव के अंश हनुमानजी ने जन्म लिया।
विपरीतताओं के बावजूद मॉं शारदा तीनो ही देवताओं की आराध्य हैं। इन्हीं मॉं शारदा ने देवी सरस्वती के रुप में रावण के भाई कुंभकर्ण, जो रावण के साथ ही ब्रह्माजी की भक्ति कर रहा था, द्वारा ब्रह्माजी से वरदान मांगते समय कोई ऐसा वरदान न मांग लिया जाए जो रावण को अमरत्व प्राप्त होने के बाद रक्ष संस्कृति के लिए सहायक सिद्ध हो के निवारणार्थ कुंभकर्ण की जिह्वा पर जा बैठी और कुंभकर्ण छः महीने सोते रहने और केवल छः महीने जागने का वरदान मांग बैठा।
देवी सरस्वती जो ऋगवेद, सामवेद और यजुर्वेद की माता होने के साथ ब्रह्मा की उत्पादक शक्ति है का वर्चस्व जैन धर्म की सोलह विद्या की देवताओं पर है। वाक्देवी के रुप में हिंदू, जैन और बौद्धों को समान रुप से पूज्य है। बौद्ध इसे मंजूश्री की आत्मा के रुप में मानते हैं। तो, हंस या मयूर वाहन पर सरस्वती जैन परम्परा में ऋतुदेवी के नाम से विख्यात हैं। पुराणों में इसका संदर्भ ब्रह्मा और विष्णु से बताया गया है। मार्कंडेय पुराण में तो इसे जगद्वात्री के रुप में संबोधित किया गया है।
हमारी मान्यताएं जो सहिष्णुता और सामंजस्य से परिपूर्ण हैं यहीं तक आकर नहीं रुकती वरन् आगे जाकर निरीश्वरवाद तक को अपनी मान्यता के दायरे में ले आती हैं। चार्वाक ने अपने निरीश्वरवाद का उद्घोष महांकाल की सीढ़ियों पर बैठकर ही किया था। उनका सिद्धांत था यावज्जीवेत सुखं जीवेत ऋणं कृत्वा घृतं पीबेत। भस्मी भूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः।। यह अपने मतों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सहिष्णुतापूर्वक मान्य करने की चरम सीमा है। चार्वाक कोई एक ही व्यक्ति नहीं, जो नास्तिकता के दर्शन को मानता है वह चार्वाक। चार्वाक दर्शन की शुरुआत वेदकाल से मानी जाती है। तो, देवताओं के गुरु बृहस्पति पहले चार्वाकवादी माने जाते हैं। कर्मकांड और बंधनों से समाज को मुक्तता का मार्ग दिखलानेवाले आध्यात्मिक स्वतंत्रता का समर्थन करनेवाले कुछ चार्वाक भी थे। परंतु, केवल अनियंत्रित स्वतंत्र जीवन का समर्थन न करते समझदार व्यक्ति ने खेती-बाडी, गो-पालन, व्यापार-व्यवसाय और दंड-नीति आदि जैसे सरल मार्ग का अवलंबन कर जीवन की भौतिक सुख-सुविधाओं का उपभोग करते हुए जीवनयापन करना चाहिए। इस प्रकार का कुछ कथन इन चार्वाकवादियों का है।
उपर्युक्त मीमांसा हमारी सहिष्णुता और आपसी सामंजस्य से उपजी व्यापक सोच को दर्शाने के लिए है और इसके पीछे है हमारी धर्म संबंधी व्यापक संकल्पना। हमारे यहां धर्म कोई बाह्याचार नहीं बल्कि धर्म वह है जिसके पालन से समाज सुव्यवस्थित रहता है। इसके लिए कुछ नियम बनाकर उनका पालन करना होता है। इससे कर्तव्य का बोध होता है। उदा. माता-पिता की सेवा करना हमारा धर्म है, सेवा ही धर्म है, निर्बल की रक्षा करना धर्म है, पशुओं पर दया करना धर्म है, यजुर्वेद में भी कहा गया है 'प्राणी मात्र को मित्र की दृष्टि से देखो" आदि। चूंकि मनुष्य को ही परमेश्वर ने बुद्धि दी है अतः मनुष्य ही अपने मूल प्राकृतिक गुणधर्मों को मोडकर नियंत्रित कर सकता है। उन पर विजय प्राप्त कर सकता है। जो पशुओं के लिए संभव नहीं। इसीलिए तो कहा गया है मनुष्य और पशु में अंतर करनेवाला विभेदक धर्म ही है। इसके लिए मनुष्य कुछ नियम बनाता है जो उसकी प्राकृतिक प्रवृत्तियों को नियंत्रित करते हैं, पशुओं से मनुष्य के अलगत्व को दर्शाते हैं। इन्हीं नियमों की मदद से मनुष्य समाज का निर्माण करता है और सामाजिक प्राणी कहलाता है। इस आधार पर ऐसी नियमावली को जो समाज या देश को सुचारु रुप से चलाने में सहायक सिद्ध हो को भी धर्म कहा जा सकता है। इस दृष्टि से हम हमारे संविधान को भी इहलोक से संबंधित विभिन्न विषयों पर के नियमों के संकलन के आधार पर आधुनिक धर्म-ग्रंथ कह सकते हैं। लेकिन इस पृथ्वी पर शायद ही कोई ऐसा धर्म हो जिसमें ईश्वर की संकल्पना न हो। इस दृष्टि से तो निरीश्वरवादियों को तो यह सहर्ष मान्य होगा। परंतु, आस्तिकों के लिए उनके ऐहिक जीवन व्यवस्था के नियंत्रक के रुप में ही केवल मान्य होगा। क्योंकि, आस्तिकों की दृष्टि में धर्म यानी इहलोक और परलोक दोनो के कल्याण की व्यवस्था। परलोक के संबंध में या मरणोत्तर अवस्था के संबंध में हर धर्म की श्रद्धा अलग-अलग है। जहां हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार जीवन का लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति है और इसके लिए जीवात्मा अपने कर्मफलानुसार तब तक जीवन ग्रहण करता रहता है जब तक कि उसके पुण्यकर्म इतने प्रबल नहीं हो जाते कि उसको मोक्ष की प्राप्ति हो जाए। वहीं ईसाइयत और इस्लाम की मरणोत्तर जीवन की संकल्पना में जजमेंट डे, न्याय दिवस, आखिरत है।
संस्कृत में एक श्लोक है - श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वाचैवार्व धार्रयतम्। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।। अर्थात् संपूर्ण धर्म का सार सुनो और सुनकर उसको भली-भांति धारण करो। वह यह कि जिस व्यवहार को तुम स्वयं अपने साथ उचित नहीं समझते, वैसा व्यवहार कभी दूसरों के साथ भी न करो।
इस धारणा और उपर्युक्त विवेचना के आधार पर सहज ही प्रतिपादित किया जा सकता है कि संविधान का पालन सभी के इहलौकिक जीवन यानी अभ्युदय के लिए समान रुप से मान्य होना चाहिए। भले ही पारलौकिक जीवन की निःश्रेयस की श्रद्धाएं भिन्न क्यों न हों और उसके लिए सर्वधर्म समादर की भावना का अंगीकार करना आवश्यक है और यह कहने मात्र से काम नहीं होगा इसके लिए हमें यह स्वीकारना होगा कि भारत एक बहुधर्मीय देश है और भविष्य में भी रहेगा। हमे हमारे धर्मों का पालन करते हुए इसी देश में, इसी देश के संविधान के अंतर्गत रहना है। धर्म की सबकी सब आज्ञाओं का पालन आज के समय में संभव नहीं इस मर्यादा को स्वीकारना होगा। यह सहज संभव हो सके इसके लिए एक दूसरे के धर्मों का अध्ययन कर एक दूसरे के मानस को समझना होगा। हां, यह सत्य है कि दूसरे धर्म का अध्ययन हर किसी के लिए सहज संभव नहीं। क्योंकि, हर एक की अपनी सीमाएं हैं। इसके लिए हर समाज के कुछ प्रबुद्ध बुद्धिजीवियों को ही आगे आकर एक दूसरे धर्मो का अध्ययन कर उसकी वास्तविकता को समाज के सामने रखना होगा।
भारत में धार्मिक बहुवाद की परंपरा बडी प्राचीन है। प्राचीनकाल से ही अनेक धर्म और उनके अनुयायी इस भूमि पर फल-फूल रहे हैं और समय के साथ उनमें जो सामंजस्य और सहिष्णुता निर्मित हुई है उसीके कारण उनकी विविधताओं में एकता के जो दर्शन होते हैं वैसे दर्शन कहीं और होना अत्यंत दुर्लभ है। इस भारतीय धर्म-धारणा और उनके दर्शन की विविधाताओं में जिस एकता के दर्शन होते हैं उसका अनुपमेय उदाहरण है शिव-परिवार। इस परिवार के प्रत्येक सदस्य के वाहन, विन्यास, प्रतीक और क्रिया-कलापों में एकतरफ तो विषमता है तो दूसरी तरफ अद्भूत एकात्मता का सुंदर परिचय प्राप्त होता है।
शिव के बारह ज्योतिर्लिगों में भारत की अखंडता के दर्शन होते हैं। जो उन्हें आदि-देव का रुप प्रदान करते हैं और पत्नी पार्वती को जगतमाताका। उनके बडे पुत्र कार्तिकेय के पास हिंदुओं द्वारा पूजे जानेवाले सभी देवताओं का सेनापतित्व है तो, दूसरे पुत्र गणेश उन सभी देवताओं में सर्वप्रथम पूज्य हैं। लेकिन स्वयं शिव स्मशान विहारी हैं। कार्तिकेय या कार्तिकस्वामी को दक्षिण भारत में सुब्रहमण्यम, मुरुगन, षणमुखम आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है। उत्तर भारत में इन्हें ब्रह्मचारी तो, दक्षिण भारत में इनकी दो पत्नियां होना माना जाता है। पहली इंद्रपुत्री देवयानी (जिसके कारण कार्तिकेय को दैवयानैमणालन कहा जाता है) कार्तिकेय से देवयानी का विवाह हो इसकी इच्छा स्वयं इंद्र ने महाविष्णु, ब्रह्मा आदि के समक्ष प्रकट की थी। जिसका सभी देवताओं ने स्वागत किया था। तो, दूसरी पत्नी वल्ली (जिसके पति होने के कारण उन्हें वल्लीमणालन भी कहा जाता है) यह पूर्व जन्म में भगवान विष्णु की पुत्री थी। इन विवाहों के वर्णन का कथानक दुर्गादास स्वामी के संक्षिप्त तमिल स्कंद पुराण में मिलता है। ठीक इसी तरह जहां गणेशजी को उत्तर भारत में विवाहित तो दक्षिण भारत में ब्रह्मचारी माना जाता है। इसी प्रकार से इनके आसपास के वातावरण को देखें तो हमें दिखाई देगा कि शिवजी गले में सर्प है जिसका शत्रु मोर है जो कार्तिकेयजी का वाहन है और गणेशजी का वाहन चूहा है जिसका शत्रु सांप है चूहा सांप का भोजन भी है। फिर भी ये सब एक साथ एक ही जगह सुख-शांति से सहअस्तित्व को स्वीकारते हुए रह रहे हैं।
शिव के भक्त शैव तो उनके विपरीत गुणधर्म वाले विष्णु के भक्त वैष्णव कहलाते हैं। इन दो प्रमुख संप्रदायों की एकता का प्रतीक है उज्जैन की हरिहर यात्रा तो दक्षिण भारत में हर और हरि के संयुक्त प्रतीक के रुप में स्वामी अयप्पा की पूजा का प्रचलन। इसी तरह से तीन प्रमुख देवताओं ब्रह्मा, विष्णु, महेश जिनमें ब्रह्माजी निर्माणकर्ता, भगवान विष्णु पालनहार तो शिवजी संहार के देवता होने के बावजूद इनके संयुक्त प्रतीक के रुप में भगवान दत्तात्रय की पूजा की जाती है। जो हमारी व्यापक सोच-सामंजस्य, सहिष्णुता के साथ ही एकता में अनेकता को स्वीकारने की प्रवृत्ति को दर्शाती है। शिवजी भोलेभंडारी तो भगवान विष्णु चतुर मायावी जिन्होंने शिवजी द्वारा भोलेपन में भस्मासुर को दिए वरदान से जिसके कारण उनके प्राण संकट में आ गए थे की रक्षा के लिए मोहिनी रुप धारण कर भस्मासुर से उनकी रक्षा की। न केवल इनके कार्य परस्पर विरोधी हैं अपितु शिवजी जो गले में सर्प को धारण किए रहते हैं का शत्रु गरुड है जो विष्णुजी का वाहन है और ब्रह्माजी का आसन कमल पुष्प है जो अति कोमल होता है। इन्हीं ब्रह्माजी के पुत्र हैं नारदमुनि जो भगवान विष्णु के भक्त होकर तीनो लोकों में विहार करते हैं और इन तीनों के संपर्क सूत्र का कार्य भी निभाहते हैं। इन तीनों का सामंजस्य देखिए कि जब ब्रह्माजी रावण की भक्ति से प्रसन्न हो उसे अमरत्व का वरदान दे बैठे तो उसके नाश के लिए विष्णुजी ने भगवान राम का अवतार लिया तो उनके सेवक के रुप में भगवान शिव के अंश हनुमानजी ने जन्म लिया।
विपरीतताओं के बावजूद मॉं शारदा तीनो ही देवताओं की आराध्य हैं। इन्हीं मॉं शारदा ने देवी सरस्वती के रुप में रावण के भाई कुंभकर्ण, जो रावण के साथ ही ब्रह्माजी की भक्ति कर रहा था, द्वारा ब्रह्माजी से वरदान मांगते समय कोई ऐसा वरदान न मांग लिया जाए जो रावण को अमरत्व प्राप्त होने के बाद रक्ष संस्कृति के लिए सहायक सिद्ध हो के निवारणार्थ कुंभकर्ण की जिह्वा पर जा बैठी और कुंभकर्ण छः महीने सोते रहने और केवल छः महीने जागने का वरदान मांग बैठा।
देवी सरस्वती जो ऋगवेद, सामवेद और यजुर्वेद की माता होने के साथ ब्रह्मा की उत्पादक शक्ति है का वर्चस्व जैन धर्म की सोलह विद्या की देवताओं पर है। वाक्देवी के रुप में हिंदू, जैन और बौद्धों को समान रुप से पूज्य है। बौद्ध इसे मंजूश्री की आत्मा के रुप में मानते हैं। तो, हंस या मयूर वाहन पर सरस्वती जैन परम्परा में ऋतुदेवी के नाम से विख्यात हैं। पुराणों में इसका संदर्भ ब्रह्मा और विष्णु से बताया गया है। मार्कंडेय पुराण में तो इसे जगद्वात्री के रुप में संबोधित किया गया है।
हमारी मान्यताएं जो सहिष्णुता और सामंजस्य से परिपूर्ण हैं यहीं तक आकर नहीं रुकती वरन् आगे जाकर निरीश्वरवाद तक को अपनी मान्यता के दायरे में ले आती हैं। चार्वाक ने अपने निरीश्वरवाद का उद्घोष महांकाल की सीढ़ियों पर बैठकर ही किया था। उनका सिद्धांत था यावज्जीवेत सुखं जीवेत ऋणं कृत्वा घृतं पीबेत। भस्मी भूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः।। यह अपने मतों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सहिष्णुतापूर्वक मान्य करने की चरम सीमा है। चार्वाक कोई एक ही व्यक्ति नहीं, जो नास्तिकता के दर्शन को मानता है वह चार्वाक। चार्वाक दर्शन की शुरुआत वेदकाल से मानी जाती है। तो, देवताओं के गुरु बृहस्पति पहले चार्वाकवादी माने जाते हैं। कर्मकांड और बंधनों से समाज को मुक्तता का मार्ग दिखलानेवाले आध्यात्मिक स्वतंत्रता का समर्थन करनेवाले कुछ चार्वाक भी थे। परंतु, केवल अनियंत्रित स्वतंत्र जीवन का समर्थन न करते समझदार व्यक्ति ने खेती-बाडी, गो-पालन, व्यापार-व्यवसाय और दंड-नीति आदि जैसे सरल मार्ग का अवलंबन कर जीवन की भौतिक सुख-सुविधाओं का उपभोग करते हुए जीवनयापन करना चाहिए। इस प्रकार का कुछ कथन इन चार्वाकवादियों का है।
उपर्युक्त मीमांसा हमारी सहिष्णुता और आपसी सामंजस्य से उपजी व्यापक सोच को दर्शाने के लिए है और इसके पीछे है हमारी धर्म संबंधी व्यापक संकल्पना। हमारे यहां धर्म कोई बाह्याचार नहीं बल्कि धर्म वह है जिसके पालन से समाज सुव्यवस्थित रहता है। इसके लिए कुछ नियम बनाकर उनका पालन करना होता है। इससे कर्तव्य का बोध होता है। उदा. माता-पिता की सेवा करना हमारा धर्म है, सेवा ही धर्म है, निर्बल की रक्षा करना धर्म है, पशुओं पर दया करना धर्म है, यजुर्वेद में भी कहा गया है 'प्राणी मात्र को मित्र की दृष्टि से देखो" आदि। चूंकि मनुष्य को ही परमेश्वर ने बुद्धि दी है अतः मनुष्य ही अपने मूल प्राकृतिक गुणधर्मों को मोडकर नियंत्रित कर सकता है। उन पर विजय प्राप्त कर सकता है। जो पशुओं के लिए संभव नहीं। इसीलिए तो कहा गया है मनुष्य और पशु में अंतर करनेवाला विभेदक धर्म ही है। इसके लिए मनुष्य कुछ नियम बनाता है जो उसकी प्राकृतिक प्रवृत्तियों को नियंत्रित करते हैं, पशुओं से मनुष्य के अलगत्व को दर्शाते हैं। इन्हीं नियमों की मदद से मनुष्य समाज का निर्माण करता है और सामाजिक प्राणी कहलाता है। इस आधार पर ऐसी नियमावली को जो समाज या देश को सुचारु रुप से चलाने में सहायक सिद्ध हो को भी धर्म कहा जा सकता है। इस दृष्टि से हम हमारे संविधान को भी इहलोक से संबंधित विभिन्न विषयों पर के नियमों के संकलन के आधार पर आधुनिक धर्म-ग्रंथ कह सकते हैं। लेकिन इस पृथ्वी पर शायद ही कोई ऐसा धर्म हो जिसमें ईश्वर की संकल्पना न हो। इस दृष्टि से तो निरीश्वरवादियों को तो यह सहर्ष मान्य होगा। परंतु, आस्तिकों के लिए उनके ऐहिक जीवन व्यवस्था के नियंत्रक के रुप में ही केवल मान्य होगा। क्योंकि, आस्तिकों की दृष्टि में धर्म यानी इहलोक और परलोक दोनो के कल्याण की व्यवस्था। परलोक के संबंध में या मरणोत्तर अवस्था के संबंध में हर धर्म की श्रद्धा अलग-अलग है। जहां हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार जीवन का लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति है और इसके लिए जीवात्मा अपने कर्मफलानुसार तब तक जीवन ग्रहण करता रहता है जब तक कि उसके पुण्यकर्म इतने प्रबल नहीं हो जाते कि उसको मोक्ष की प्राप्ति हो जाए। वहीं ईसाइयत और इस्लाम की मरणोत्तर जीवन की संकल्पना में जजमेंट डे, न्याय दिवस, आखिरत है।
संस्कृत में एक श्लोक है - श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वाचैवार्व धार्रयतम्। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।। अर्थात् संपूर्ण धर्म का सार सुनो और सुनकर उसको भली-भांति धारण करो। वह यह कि जिस व्यवहार को तुम स्वयं अपने साथ उचित नहीं समझते, वैसा व्यवहार कभी दूसरों के साथ भी न करो।
इस धारणा और उपर्युक्त विवेचना के आधार पर सहज ही प्रतिपादित किया जा सकता है कि संविधान का पालन सभी के इहलौकिक जीवन यानी अभ्युदय के लिए समान रुप से मान्य होना चाहिए। भले ही पारलौकिक जीवन की निःश्रेयस की श्रद्धाएं भिन्न क्यों न हों और उसके लिए सर्वधर्म समादर की भावना का अंगीकार करना आवश्यक है और यह कहने मात्र से काम नहीं होगा इसके लिए हमें यह स्वीकारना होगा कि भारत एक बहुधर्मीय देश है और भविष्य में भी रहेगा। हमे हमारे धर्मों का पालन करते हुए इसी देश में, इसी देश के संविधान के अंतर्गत रहना है। धर्म की सबकी सब आज्ञाओं का पालन आज के समय में संभव नहीं इस मर्यादा को स्वीकारना होगा। यह सहज संभव हो सके इसके लिए एक दूसरे के धर्मों का अध्ययन कर एक दूसरे के मानस को समझना होगा। हां, यह सत्य है कि दूसरे धर्म का अध्ययन हर किसी के लिए सहज संभव नहीं। क्योंकि, हर एक की अपनी सीमाएं हैं। इसके लिए हर समाज के कुछ प्रबुद्ध बुद्धिजीवियों को ही आगे आकर एक दूसरे धर्मो का अध्ययन कर उसकी वास्तविकता को समाज के सामने रखना होगा।
Tuesday, March 13, 2012
सप्तर्षि - मन्वन्तर
मण्डल आकाश में सुप्रसिद्ध ज्योतिर्मण्डलों में है। इसके अधिष्ठाता ऋषिगण लोक में ज्ञान-परम्परा को सुरक्षित रखते हैं। अधिकारी जिज्ञासु को प्रत्यक्ष या परोक्ष, जैसा वह अधिकारी हो, तत्त्वज्ञान की ओर उन्मुख करके मुक्ति-पथ में लगाते हैं।
प्रत्येक मन्वन्तर में इनमें से कुछ ऋषि परिवर्तित होते रहते हैं।
विष्णु पुराण के अनुसार इनकी नामावली इस प्रकार है-
...
प्रथम स्वायम्भुव मन्वन्तर में- मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वशिष्ठ।
द्वितीय स्वारोचिष मन्वन्तर में— ऊर्ज्ज, स्तम्भ, वात, प्राण, पृषभ, निरय और परीवान।
तृतीय उत्तम मन्वन्तर में— महर्षि वशिष्ठ के सातों पुत्र।
चतुर्थ तामस मन्वन्तर में— ज्योतिर्धामा, पृथु, काव्य, चैत्र, अग्नि, वनक और पीवर।
पंचम रैवत मन्वन्तर में— हिरण्यरोमा, वेदश्री, ऊर्ध्वबाहु, वेदबाहु, सुधामा, पर्जन्य और महामुनि।
षष्ठ चाक्षुष मन्वन्तर में— सुमेधा, विरजा, हविष्मान, उतम, मधु, अतिनामा और सहिष्णु।
वर्तमान सप्तम वैवस्वत मन्वन्तर में— कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भारद्वाज।
अष्टम सावर्णिक मन्वन्तर में— गालव, दीप्तिमान, परशुराम, अश्वत्थामा, कृप, ऋष्यश्रृंग और व्यास।
नवम दक्षसावर्णि मन्वन्तर में— मेधातिथि, वसु, सत्य, ज्योतिष्मान, द्युतिमान, सबन और भव्य।
दशम ब्रह्मसावर्णि मन्वन्तर में— तपोमूर्ति, हविष्मान, सुकृत, सत्य, नाभाग, अप्रतिमौजा और सत्यकेतु।
एकादश धर्मसावर्णि मन्वन्तर में— वपुष्मान्, घृणि, आरुणि, नि:स्वर, हविष्मान्, अनघ, और अग्नितेजा।
द्वादश रुद्रसावर्णि मन्वन्तर में— तपोद्युति, तपस्वी, सुतपा, तपोमूर्ति, तपोनिधि, तपोरति और तपोधृति।
त्रयोदश देवसावर्णि मन्वन्तर में— धृतिमान्, अव्यय, तत्त्वदर्शी, निरूत्सुक, निर्मोह, सुतपा और निष्प्रकम्प।
चतुर्दश इन्द्रसावर्णि मन्वन्तर में— अग्नीध्र, अग्नि, बाहु, शुचि, युक्त, मागध, शुक्र और अजित।।
इन ऋषियों में से सब कल्पान्त-चिरजीवी, मुक्तात्मा और दिव्यदेहधारी हैं।
'शतपथ ब्राह्मण' के अनुसार
गौतम,
भारद्वाज,
विश्वामित्र,
जमदग्नि,
वसिष्ठ,
कश्यप और
अत्रि तथा
'महाभारत' के अनुसार
मरीचि,
अत्रि,
अंगिरा,
पुलह,
क्रतु,
पुलस्त्य और
वसिष्ठ सप्तर्षि माने गये हैं।
इसके अतिरिक्त सप्तऋषि से उन सात तारों का बोध होता है, जो ध्रुवतारा की परिक्रमा करते हैं।
******* मन्वन्तर क्या होता है *******
सृष्टि की आयु का अनुमान लगाने के लिये चार युगों
सत युग,
त्रेता युग,
द्वापर युग,और
कलि युग का एक 'महायुग' माना जाता है ।
71 महायुग मिलकर एक 'मन्वंतर' बनाता है।
महायुग की अवधि 43 लाख 20 हज़ार वर्ष मानी गई है।
14 मन्वंतरों का एक 'कल्प' होता है।
प्रत्येक मन्वंतर में सृष्टि का एक मनु होता है और उसी के नाम पर उस मन्वंतर का नाम पड़ता है।
मानवीय गणना के अनुसार एक मन्वंतर में तीस करोड़ ,अड़सठ लाख , बीस हज़ार वर्ष होते हैं ।
पुराणों में चौदह मन्वंतर इस प्रकार हैं-
स्वायंभुव ,
स्वारोचिष,
उत्तम ,
तामस,
रैवत,
चाक्षुष,
वैवस्वत,
अर्क सावर्णि,
दक्ष सावर्णि,
ब्रह्म सावर्णि,
धर्म सावर्णि,
रुद्र सावर्णि,
रौच्य,
भौत्य।
इनमें से चाक्षुस तक के मन्वंतर बीत चुके हैं ।
वैवस्वत इस समय चल रहा है । संकल्प आदि में इसी का नामोच्चार होता है ।
प्रत्येक मन्वन्तर में इनमें से कुछ ऋषि परिवर्तित होते रहते हैं।
विष्णु पुराण के अनुसार इनकी नामावली इस प्रकार है-
...
प्रथम स्वायम्भुव मन्वन्तर में- मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वशिष्ठ।
द्वितीय स्वारोचिष मन्वन्तर में— ऊर्ज्ज, स्तम्भ, वात, प्राण, पृषभ, निरय और परीवान।
तृतीय उत्तम मन्वन्तर में— महर्षि वशिष्ठ के सातों पुत्र।
चतुर्थ तामस मन्वन्तर में— ज्योतिर्धामा, पृथु, काव्य, चैत्र, अग्नि, वनक और पीवर।
पंचम रैवत मन्वन्तर में— हिरण्यरोमा, वेदश्री, ऊर्ध्वबाहु, वेदबाहु, सुधामा, पर्जन्य और महामुनि।
षष्ठ चाक्षुष मन्वन्तर में— सुमेधा, विरजा, हविष्मान, उतम, मधु, अतिनामा और सहिष्णु।
वर्तमान सप्तम वैवस्वत मन्वन्तर में— कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भारद्वाज।
अष्टम सावर्णिक मन्वन्तर में— गालव, दीप्तिमान, परशुराम, अश्वत्थामा, कृप, ऋष्यश्रृंग और व्यास।
नवम दक्षसावर्णि मन्वन्तर में— मेधातिथि, वसु, सत्य, ज्योतिष्मान, द्युतिमान, सबन और भव्य।
दशम ब्रह्मसावर्णि मन्वन्तर में— तपोमूर्ति, हविष्मान, सुकृत, सत्य, नाभाग, अप्रतिमौजा और सत्यकेतु।
एकादश धर्मसावर्णि मन्वन्तर में— वपुष्मान्, घृणि, आरुणि, नि:स्वर, हविष्मान्, अनघ, और अग्नितेजा।
द्वादश रुद्रसावर्णि मन्वन्तर में— तपोद्युति, तपस्वी, सुतपा, तपोमूर्ति, तपोनिधि, तपोरति और तपोधृति।
त्रयोदश देवसावर्णि मन्वन्तर में— धृतिमान्, अव्यय, तत्त्वदर्शी, निरूत्सुक, निर्मोह, सुतपा और निष्प्रकम्प।
चतुर्दश इन्द्रसावर्णि मन्वन्तर में— अग्नीध्र, अग्नि, बाहु, शुचि, युक्त, मागध, शुक्र और अजित।।
इन ऋषियों में से सब कल्पान्त-चिरजीवी, मुक्तात्मा और दिव्यदेहधारी हैं।
'शतपथ ब्राह्मण' के अनुसार
गौतम,
भारद्वाज,
विश्वामित्र,
जमदग्नि,
वसिष्ठ,
कश्यप और
अत्रि तथा
'महाभारत' के अनुसार
मरीचि,
अत्रि,
अंगिरा,
पुलह,
क्रतु,
पुलस्त्य और
वसिष्ठ सप्तर्षि माने गये हैं।
इसके अतिरिक्त सप्तऋषि से उन सात तारों का बोध होता है, जो ध्रुवतारा की परिक्रमा करते हैं।
******* मन्वन्तर क्या होता है *******
सृष्टि की आयु का अनुमान लगाने के लिये चार युगों
सत युग,
त्रेता युग,
द्वापर युग,और
कलि युग का एक 'महायुग' माना जाता है ।
71 महायुग मिलकर एक 'मन्वंतर' बनाता है।
महायुग की अवधि 43 लाख 20 हज़ार वर्ष मानी गई है।
14 मन्वंतरों का एक 'कल्प' होता है।
प्रत्येक मन्वंतर में सृष्टि का एक मनु होता है और उसी के नाम पर उस मन्वंतर का नाम पड़ता है।
मानवीय गणना के अनुसार एक मन्वंतर में तीस करोड़ ,अड़सठ लाख , बीस हज़ार वर्ष होते हैं ।
पुराणों में चौदह मन्वंतर इस प्रकार हैं-
स्वायंभुव ,
स्वारोचिष,
उत्तम ,
तामस,
रैवत,
चाक्षुष,
वैवस्वत,
अर्क सावर्णि,
दक्ष सावर्णि,
ब्रह्म सावर्णि,
धर्म सावर्णि,
रुद्र सावर्णि,
रौच्य,
भौत्य।
इनमें से चाक्षुस तक के मन्वंतर बीत चुके हैं ।
वैवस्वत इस समय चल रहा है । संकल्प आदि में इसी का नामोच्चार होता है ।
Social Maths !
Truth = Honesty
Love = Compassion
Courage = Valor
Truth + Love = Justice
Truth + Courage = Honor
... Love + Courage = Sacrifice
Truth + Love + Courage = Spirituality
The absence of Truth, Love, and Courage is Pride, the opposite of which is Humility.
Love = Compassion
Courage = Valor
Truth + Love = Justice
Truth + Courage = Honor
... Love + Courage = Sacrifice
Truth + Love + Courage = Spirituality
The absence of Truth, Love, and Courage is Pride, the opposite of which is Humility.
महादेव का व्यापक चरित्र
शिव...........?????????????????
अनादि, अनंत, देवाधिदेव, महादेव शिव परंब्रह्म हैं| सहस्र नामों से जाने जाने वाले त्र्यम्बकम् शिव साकार, निराकार, ॐकार और लिंगाकार रूप में देवताओं, दानवों तथा मानवों द्वारा पुजित हैं| महादेव रहस्यों के भंडार हैं| बड़े-बड़े ॠषि-महर्षि, ज्ञानी, साधक, भक्त और यहाँ तक कि भगवान भी उनके संम्पूर्ण रहस्य नहीं जान पाए| आशुतोष भगवान अपने व्यक्त रूप में त्रिलोकी के तीन देवताओं म...ें ब्रह्मा एवं विष्णु के साथ रुद्र रूप में विराजमान हैं| ये त्रिदेव, हिन्दु धर्म के आधार और सर्वोच्च शिखर हैं| पर वास्तव में महादेव त्रिदेवों के भी रचयिता हैं| महादेव का चरित्र इतना व्यापक है कि कइ बार उनके व्याख्यान में विरोधाभाष तक हो जाता है| एक ओर शिव संहारक कहे जाते हैं तो दूसरी ओर वे परंब्रह्म हैं जिस लिंगाकार रूप में वे सबसे ज्यादा पूज्य हैं| जहां वे संसार के मूल हैं वहीं वे अकर्ता हैं| जहां उनका चित्रण श्याम वर्ण में होता है वहीं वे कर्पूर की तरह गोरे, कर्पूर गौरं, माने जाते हैं| जिन भगवान रूद्र के क्रोध एवं तीसरे नेत्र के खुलने के भय से संसार अक्रांत होता है और जो अनाचार करने पर अपने कागभुष्डीं जैसे भक्तों तथा ब्रह्मा जैसे त्रिदेवों को भी दण्डित करने से नहीं चुकते, वही आसुतोष भगवान अपने सरलता के कारण भोलेनाथ हैं तथा थोडी भक्ति से ही किसी से भी प्रसन्न हो जाते हैं| एक ओर रूद्र मृत्यु के देवता माने जाते हैं तो महामृत्यंजय भी उनके अलावा कोई दुसरा नहीं
पर उस विरोधाभाष में भी एका स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है| आइए जानने की कोशिश करतें हैं आसुतोष भगवान के उन मनमोहन रूपों को जिसकी व्याख्यान प्राचीन आचार्यों तथा देवगणों ने कलमबद्ध किया है|
अनादि, अनंत, देवाधिदेव, महादेव शिव परंब्रह्म हैं| सहस्र नामों से जाने जाने वाले त्र्यम्बकम् शिव साकार, निराकार, ॐकार और लिंगाकार रूप में देवताओं, दानवों तथा मानवों द्वारा पुजित हैं| महादेव रहस्यों के भंडार हैं| बड़े-बड़े ॠषि-महर्षि, ज्ञानी, साधक, भक्त और यहाँ तक कि भगवान भी उनके संम्पूर्ण रहस्य नहीं जान पाए| आशुतोष भगवान अपने व्यक्त रूप में त्रिलोकी के तीन देवताओं म...ें ब्रह्मा एवं विष्णु के साथ रुद्र रूप में विराजमान हैं| ये त्रिदेव, हिन्दु धर्म के आधार और सर्वोच्च शिखर हैं| पर वास्तव में महादेव त्रिदेवों के भी रचयिता हैं| महादेव का चरित्र इतना व्यापक है कि कइ बार उनके व्याख्यान में विरोधाभाष तक हो जाता है| एक ओर शिव संहारक कहे जाते हैं तो दूसरी ओर वे परंब्रह्म हैं जिस लिंगाकार रूप में वे सबसे ज्यादा पूज्य हैं| जहां वे संसार के मूल हैं वहीं वे अकर्ता हैं| जहां उनका चित्रण श्याम वर्ण में होता है वहीं वे कर्पूर की तरह गोरे, कर्पूर गौरं, माने जाते हैं| जिन भगवान रूद्र के क्रोध एवं तीसरे नेत्र के खुलने के भय से संसार अक्रांत होता है और जो अनाचार करने पर अपने कागभुष्डीं जैसे भक्तों तथा ब्रह्मा जैसे त्रिदेवों को भी दण्डित करने से नहीं चुकते, वही आसुतोष भगवान अपने सरलता के कारण भोलेनाथ हैं तथा थोडी भक्ति से ही किसी से भी प्रसन्न हो जाते हैं| एक ओर रूद्र मृत्यु के देवता माने जाते हैं तो महामृत्यंजय भी उनके अलावा कोई दुसरा नहीं
पर उस विरोधाभाष में भी एका स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है| आइए जानने की कोशिश करतें हैं आसुतोष भगवान के उन मनमोहन रूपों को जिसकी व्याख्यान प्राचीन आचार्यों तथा देवगणों ने कलमबद्ध किया है|
Om Namah Shivaya
नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मे "न" काराय नमः शिवायः॥
मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय।
मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मे "म" काराय नमः शिवायः॥
शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय|
श्री नीलकंठाय वृषभद्धजाय तस्मै "शि" काराय नमः शिवायः॥
वषिष्ठ कुभोदव गौतमाय मुनींद्र देवार्चित शेखराय।
चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय तस्मै "व" काराय नमः शिवायः॥
यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय|
दिव्याय देवाय दिगंबराय तस्मै "य" काराय नमः शिवायः॥
पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेत शिव सन्निधौ|
शिवलोकं वाप्नोति शिवेन सह मोदते॥
नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मे "न" काराय नमः शिवायः॥
मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय।
मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मे "म" काराय नमः शिवायः॥
शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय|
श्री नीलकंठाय वृषभद्धजाय तस्मै "शि" काराय नमः शिवायः॥
वषिष्ठ कुभोदव गौतमाय मुनींद्र देवार्चित शेखराय।
चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय तस्मै "व" काराय नमः शिवायः॥
यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय|
दिव्याय देवाय दिगंबराय तस्मै "य" काराय नमः शिवायः॥
पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेत शिव सन्निधौ|
शिवलोकं वाप्नोति शिवेन सह मोदते॥
आर्य और द्रविड़ दोनों गुण वाचक शब्द है ,जाति वाचक नहीं
--------------------------------इतिहास -(५}----------------------------------------
आर्य और द्रविड़ दोनों गुण वाचक शब्द है ,जाति वाचक नहीं । परन्तु ब्रिटिश इतिहासकारों ने इनका जातिवाचक प्रयोग कर देश में विखराव पैदा कर दिया।यह वैसा ही शरारती कारनामा था जैसा राम जन्मभूमि आन्दोलन केसमय अर्जुन सिंह ने किया था ।सहमत (सफ़दर हाशमी मेमोरिअल ट्रस्ट )द्वारा अयोध्या में एक पोस्टर में -राम ने जनक (फादर )सुता (डाटर)से विवाह किया का अनुवाद अर्जुन सिंह के चहेतों ने किया राम मेरीड हिज फादर्स डाटर ।अंग्रेजो और काले अंग्रेजो में कैसी समानता है ।
आर्य का अर्थ है सुसभ्य ,सुसंस्कृत ।सभी वैदिक विद्वान् यही अर्थ करते है ।
प्रियं माँ क्रनु देवेसु प्रियं राजसु माँ कृधि
प्रियं सर्वत्र पश्यत इत शूद्रे उत आर्ये द्रविड़ अर्थ होता है धन संपत्ति हम भगवान को द्रविड़ कहते है -त्वमेव विद्या द्रविड़म त्वमेव ।
उत्तर के लोग दक्षिण वालो को द्रविड़इसलिए कहते थे क्यों कि दक्षिण वालो ने कभी लोहे के पानी का स्वाद नहीं चखा ।विदेशी आक्रान्ताओ ने विन्द्याचल के नीचे लूटमार नहीं की। सोने की एक मात्र खान दक्षिण भारत में ,हीरो की खाने दक्षिण में ,मसाले दक्षिण में ,बार बार आक्रमण न होने से राजनीतिक स्थिरता एवं शांति के कारण निर्वाध व्यापार ।इस कारण दक्षिण भारतीय द्रविड़ कहलाते थे ।वे धनाड्य थे जाति नहीं ।क्रमशः ----
आर्य और द्रविड़ दोनों गुण वाचक शब्द है ,जाति वाचक नहीं । परन्तु ब्रिटिश इतिहासकारों ने इनका जातिवाचक प्रयोग कर देश में विखराव पैदा कर दिया।यह वैसा ही शरारती कारनामा था जैसा राम जन्मभूमि आन्दोलन केसमय अर्जुन सिंह ने किया था ।सहमत (सफ़दर हाशमी मेमोरिअल ट्रस्ट )द्वारा अयोध्या में एक पोस्टर में -राम ने जनक (फादर )सुता (डाटर)से विवाह किया का अनुवाद अर्जुन सिंह के चहेतों ने किया राम मेरीड हिज फादर्स डाटर ।अंग्रेजो और काले अंग्रेजो में कैसी समानता है ।
आर्य का अर्थ है सुसभ्य ,सुसंस्कृत ।सभी वैदिक विद्वान् यही अर्थ करते है ।
प्रियं माँ क्रनु देवेसु प्रियं राजसु माँ कृधि
प्रियं सर्वत्र पश्यत इत शूद्रे उत आर्ये द्रविड़ अर्थ होता है धन संपत्ति हम भगवान को द्रविड़ कहते है -त्वमेव विद्या द्रविड़म त्वमेव ।
उत्तर के लोग दक्षिण वालो को द्रविड़इसलिए कहते थे क्यों कि दक्षिण वालो ने कभी लोहे के पानी का स्वाद नहीं चखा ।विदेशी आक्रान्ताओ ने विन्द्याचल के नीचे लूटमार नहीं की। सोने की एक मात्र खान दक्षिण भारत में ,हीरो की खाने दक्षिण में ,मसाले दक्षिण में ,बार बार आक्रमण न होने से राजनीतिक स्थिरता एवं शांति के कारण निर्वाध व्यापार ।इस कारण दक्षिण भारतीय द्रविड़ कहलाते थे ।वे धनाड्य थे जाति नहीं ।क्रमशः ----
Wednesday, March 7, 2012
अपनी भारत की संस्कृति को पहचाने
अपनी भारत की संस्कृति को पहचाने --- दो पक्ष - कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष ! तीन ऋण - देव ऋण, पित्र ऋण एवं ऋषि त्रण ! चार युग - सतयुग , त्रेता युग , द्वापरयुग एवं कलयुग ! चार धाम - द्वारिका , बद्रीनाथ, जगन्नाथ पूरी एवं रामेश्वरम
धाम ! चारपीठ - शारदा पीठ ( द्वारिका ), ज्योतिष पीठ
( जोशीमठ बद्रिधाम), गोवर्धन पीठ ( जगन्नाथपुरी ) एवं
श्रन्गेरिपीठ ! चर वेद- ऋग्वेद , अथर्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद ! चार आश्रम - ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , बानप्रस्थ एवं संन्यास ! चार अंतःकरण - मन , बुद्धि , चित्त , एवं अहंकार ! पञ्च गव्य - गाय का घी , दूध , दही , गोमूत्र एवं गोबर , ! पञ्च देव - गणेश , विष्णु , शिव , देवी और सूर्य ! पंच तत्त्व - प्रथ्वी , जल , अग्नि , वायु एवं आकाश ! छह दर्शन - वैशेषिक , न्याय , सांख्य, योग , पूर्व मिसांसा एवं
दक्षिण मिसांसा ! सप्त ऋषि - विश्वामित्र , जमदाग्नि , भरद्वाज , गौतम ,
... अत्री , वशिष्ठ और कश्यप ! सप्त पूरी - अयोध्या पूरी , मथुरा पूरी , माया पूरी ( हरिद्वार ) ,
कशी , कांची ( शिन कांची - विष्णु कांची ) , अवंतिका और
द्वारिका पूरी ! आठ योग - यम , नियम, आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार ,
धारणा , ध्यान एवं समाधी ! आठ लक्ष्मी - आग्घ , विद्या , सौभाग्य , अमृत , काम , सत्य ,
भोग , एवं योग लक्ष्मी ! नव दुर्गा - शैल पुत्री , ब्रह्मचारिणी , चंद्रघंटा , कुष्मांडा ,
स्कंदमाता , कात्यायिनी , कालरात्रि , महागौरी एवं
सिद्धिदात्री ! दस दिशाएं - पूर्व , पश्चिम , उत्तर , दक्षिण , इशान ,
नेत्रत्य , वायव्य आग्नेय ,आकाश एवं पाताल ! मुख्या ग्यारह अवतार - मत्स्य , कच्छप , बराह , नरसिंह ,
बामन , परशुराम , श्री राम , कृष्ण , बलराम , बुद्ध , एवं कल्कि ! बारह मास - चेत्र , वैशाख , ज्येष्ठ ,अषाड़ , श्रावन , भाद्रपद ,
अश्विन , कार्तिक , मार्गशीर्ष . पौष , माघ , फागुन ! बारह राशी - मेष , ब्रषभ , मिथुन , कर्क , सिंह , तुला ,
ब्रश्चिक , धनु , मकर , कुम्भ , एवं कन्या ! बारह ज्योतिर्लिंग - सोमनाथ , मल्लिकर्जुना , महाकाल ,
ओमकालेश्वर , बैजनाथ , रामेश्वरम , विश्वनाथ ,
त्रियम्वाकेश्वर , केदारनाथ , घुष्नेश्वर , भीमाशंकर एवं
नागेश्वर ! पंद्रह तिथियाँ - प्रतिपदा , द्वतीय , तृतीय , चतुर्थी ,
पंचमी , षष्ठी , सप्तमी , अष्टमी , नवमी , दशमी , एकादशी ,
द्वादशी , त्रयोदशी , चतुर्दशी , पूर्णिमा , अमावश्या ! स्म्रतियां - मनु , विष्णु, अत्री , हारीत , याज्ञवल्क्य ,
उशना , अंगीरा , यम , आपस्तम्ब , सर्वत , कात्यायन ,
ब्रहस्पति , पराशर , व्यास , शांख्य , लिखित , दक्ष ,
शातातप , वशिष्ठ !
धाम ! चारपीठ - शारदा पीठ ( द्वारिका ), ज्योतिष पीठ
( जोशीमठ बद्रिधाम), गोवर्धन पीठ ( जगन्नाथपुरी ) एवं
श्रन्गेरिपीठ ! चर वेद- ऋग्वेद , अथर्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद ! चार आश्रम - ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , बानप्रस्थ एवं संन्यास ! चार अंतःकरण - मन , बुद्धि , चित्त , एवं अहंकार ! पञ्च गव्य - गाय का घी , दूध , दही , गोमूत्र एवं गोबर , ! पञ्च देव - गणेश , विष्णु , शिव , देवी और सूर्य ! पंच तत्त्व - प्रथ्वी , जल , अग्नि , वायु एवं आकाश ! छह दर्शन - वैशेषिक , न्याय , सांख्य, योग , पूर्व मिसांसा एवं
दक्षिण मिसांसा ! सप्त ऋषि - विश्वामित्र , जमदाग्नि , भरद्वाज , गौतम ,
... अत्री , वशिष्ठ और कश्यप ! सप्त पूरी - अयोध्या पूरी , मथुरा पूरी , माया पूरी ( हरिद्वार ) ,
कशी , कांची ( शिन कांची - विष्णु कांची ) , अवंतिका और
द्वारिका पूरी ! आठ योग - यम , नियम, आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार ,
धारणा , ध्यान एवं समाधी ! आठ लक्ष्मी - आग्घ , विद्या , सौभाग्य , अमृत , काम , सत्य ,
भोग , एवं योग लक्ष्मी ! नव दुर्गा - शैल पुत्री , ब्रह्मचारिणी , चंद्रघंटा , कुष्मांडा ,
स्कंदमाता , कात्यायिनी , कालरात्रि , महागौरी एवं
सिद्धिदात्री ! दस दिशाएं - पूर्व , पश्चिम , उत्तर , दक्षिण , इशान ,
नेत्रत्य , वायव्य आग्नेय ,आकाश एवं पाताल ! मुख्या ग्यारह अवतार - मत्स्य , कच्छप , बराह , नरसिंह ,
बामन , परशुराम , श्री राम , कृष्ण , बलराम , बुद्ध , एवं कल्कि ! बारह मास - चेत्र , वैशाख , ज्येष्ठ ,अषाड़ , श्रावन , भाद्रपद ,
अश्विन , कार्तिक , मार्गशीर्ष . पौष , माघ , फागुन ! बारह राशी - मेष , ब्रषभ , मिथुन , कर्क , सिंह , तुला ,
ब्रश्चिक , धनु , मकर , कुम्भ , एवं कन्या ! बारह ज्योतिर्लिंग - सोमनाथ , मल्लिकर्जुना , महाकाल ,
ओमकालेश्वर , बैजनाथ , रामेश्वरम , विश्वनाथ ,
त्रियम्वाकेश्वर , केदारनाथ , घुष्नेश्वर , भीमाशंकर एवं
नागेश्वर ! पंद्रह तिथियाँ - प्रतिपदा , द्वतीय , तृतीय , चतुर्थी ,
पंचमी , षष्ठी , सप्तमी , अष्टमी , नवमी , दशमी , एकादशी ,
द्वादशी , त्रयोदशी , चतुर्दशी , पूर्णिमा , अमावश्या ! स्म्रतियां - मनु , विष्णु, अत्री , हारीत , याज्ञवल्क्य ,
उशना , अंगीरा , यम , आपस्तम्ब , सर्वत , कात्यायन ,
ब्रहस्पति , पराशर , व्यास , शांख्य , लिखित , दक्ष ,
शातातप , वशिष्ठ !
Friday, March 2, 2012
What is your nature(स्वभाव)? Swine like or Swan like? (FB)
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What is your nature(स्वभाव)? Swine like or Swan like?
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... Some people have swine tendency of interacting with environment. Like swine, they cannot distinguish between mud and matter of concern and intake everything. They read everything. They watch everything. They talk on everything. Good, bad, grotesque – don’t matter to them. Perceptions created by muddy inputs – don’t matter to them. They love to remain chaos and diseased state. Mutations are normal conditions for them.
Strikingly different, unlike swine, some have Swan tendency. They are skilled in identifying pollutants and stay away from pollutants. They remain in company of good. They ignore bad. They have discrimination power.
**How do you eat? Like swine (Fast food, trite food) or swan (Satvik ,pure, fresh and nutritive food, irrespective of tastes)?
**How do you breathe? Like swine (irregular, unscientific) or like Swan (Rhythmic, scientific, accordance with nature of respiratory system)
**What do read? Like swine (anything, junk newspapers, gossip crap on page 3) or like swan (editorials, research papers)?
**What do you watch? Like swine (anything and everything that comes on channels, Cricket (or Football) or like Swan (Selective, helpful, light entertainment which cannot carry your mind out after watching)?
Intake determines perceptions. Enquire before intake. Like swan, unlike swine.
An endless science, as we know, is grammar.
And life is short; the hindrances are many.
Essentials keep, leaving the non-essential,
As swans drink up the milk, but leave the water
-पंचतंत्र
" By him who is free from passion what is to be left [i. e. Nature] is left, and what is to be taken [i. e. Soul] is taken; as in the case of the swan and the milk."'
- Samkhya aphorism
"Others see not the difference when water is mixed with milk, but the
swan at once separates the milk and the water; so too when the
souls are absorbed in the supreme Brahman, the Lord,-the faithful,
who have received the Guru's words, can at once draw a difference between them."
-Tattva Muktavali
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेत: तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीर: |
श्रेयो हि धीरोभिप्रेयसो वॄणीते प्रेयो मन्दो षोगक्षेमाद् वॄणीते ||
-कठ उपनिषद्
Both the good (Shreyas) and the pleasant (Preyas) approch the man. The wise man pondering over them, makes his choice. The wise(Swan) chooses the good (Shreyas) in preference to the pleasant (Preyas). The fool (simple-minded swine) for the sake of worldly-being prefers the pleasant (preyas)
-Katha Upanishad
This is the reason; iconography of Maa Saraswati – goddess of knowledge – is not completed without swan – the discriminative ability described by Bhagwad Gita.
===================
The aquatic bird swan lives on lakes that abound in lotuses, and subsists in a measure upon the underground stalk of the lotus plant (such a stalk is called bisa), whose joint (granthi), when crushed (bhagna), exudes a juice designated by the word ksira, which is also a common name for milk. Thus the bird, as it floats on the lake, may be said to drink ksira or milk out of water.
What is your nature(स्वभाव)? Swine like or Swan like?
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... Some people have swine tendency of interacting with environment. Like swine, they cannot distinguish between mud and matter of concern and intake everything. They read everything. They watch everything. They talk on everything. Good, bad, grotesque – don’t matter to them. Perceptions created by muddy inputs – don’t matter to them. They love to remain chaos and diseased state. Mutations are normal conditions for them.
Strikingly different, unlike swine, some have Swan tendency. They are skilled in identifying pollutants and stay away from pollutants. They remain in company of good. They ignore bad. They have discrimination power.
**How do you eat? Like swine (Fast food, trite food) or swan (Satvik ,pure, fresh and nutritive food, irrespective of tastes)?
**How do you breathe? Like swine (irregular, unscientific) or like Swan (Rhythmic, scientific, accordance with nature of respiratory system)
**What do read? Like swine (anything, junk newspapers, gossip crap on page 3) or like swan (editorials, research papers)?
**What do you watch? Like swine (anything and everything that comes on channels, Cricket (or Football) or like Swan (Selective, helpful, light entertainment which cannot carry your mind out after watching)?
Intake determines perceptions. Enquire before intake. Like swan, unlike swine.
An endless science, as we know, is grammar.
And life is short; the hindrances are many.
Essentials keep, leaving the non-essential,
As swans drink up the milk, but leave the water
-पंचतंत्र
" By him who is free from passion what is to be left [i. e. Nature] is left, and what is to be taken [i. e. Soul] is taken; as in the case of the swan and the milk."'
- Samkhya aphorism
"Others see not the difference when water is mixed with milk, but the
swan at once separates the milk and the water; so too when the
souls are absorbed in the supreme Brahman, the Lord,-the faithful,
who have received the Guru's words, can at once draw a difference between them."
-Tattva Muktavali
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेत: तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीर: |
श्रेयो हि धीरोभिप्रेयसो वॄणीते प्रेयो मन्दो षोगक्षेमाद् वॄणीते ||
-कठ उपनिषद्
Both the good (Shreyas) and the pleasant (Preyas) approch the man. The wise man pondering over them, makes his choice. The wise(Swan) chooses the good (Shreyas) in preference to the pleasant (Preyas). The fool (simple-minded swine) for the sake of worldly-being prefers the pleasant (preyas)
-Katha Upanishad
This is the reason; iconography of Maa Saraswati – goddess of knowledge – is not completed without swan – the discriminative ability described by Bhagwad Gita.
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The aquatic bird swan lives on lakes that abound in lotuses, and subsists in a measure upon the underground stalk of the lotus plant (such a stalk is called bisa), whose joint (granthi), when crushed (bhagna), exudes a juice designated by the word ksira, which is also a common name for milk. Thus the bird, as it floats on the lake, may be said to drink ksira or milk out of water.
Real purpose of LIfe!
प्यारे मित्रों आदमी अपने आप को नहीं जानता इसलिए ,आखोवाला अंधा है ,टटोल टटोल कर दूसरों के बनाये मार्ग पर चल रहा है उसका कोई निजी अनुभव धर्म के मार्ग में नहीं है ,उसकी जीबन धारा बाहर की तरफ ही बह रही है ,उसकी सारी इन्द्रियाँ बाहर का मार्ग बताती है ,बह सब कुछ बाहर ही खोजता है ,धन ,पदार्थ ,सुख , काम ,धर्म ,बाहर के मूर्छा में उसे अपने अंदर मोजूद परमात्मा का कुछ अता-पता नहीं है ,शान्ती भी बाहर खोजता है ...मृगतृष्णा की तरह ,आनद भी बाहर खोजता है जैसे कुत्ते को सूखी हड्डी चबाने में आनंद मिलता है जबकि उसके मसूड़े से आने बाला खून उसे हड्डी से आता लगता है ,अच्छे अच्छे बिद्बन भी इस माया से सम्मोहित है ,पूरा जीबन ख्याति ,प्रतिस्ठा पाने मै खो देते है अपने आप को पा ही नहीं पाते ,और तो और आपने आपको पाना भी कुछ है ये भी नहीं जानते . बाहर का बहाव संसार है चाहे आप कुछ भी करे ,माया है ,अंदर की यात्रा धर्म है ,जो आपको अशान्त करे बह अधरर्म है ,जो शांती दे बो धर्म है नशे की शांती नही, गहरी बात है हल्के से मत लेना ,बाहर कुछ करना तो बहुत सरल है कृत्य सदा सरल है अंदर अकृत्य मै ठहरना कठिन है ,जिसको आप जीबन मान बैठे हो बो तो जीबन का अधिस्ठआन है जीबन का आधार तो जाना ही नहीं बही धर्म है ,क्योकि बह आपको धारण करता है ,समस्त धर्म बाहर धकेल रहे है इसलिए आदमी धर्म के आधार से बंचित है अन्जान है ,मै उसी आधार से अपने मित्रों को मिलाना चाहता हूँ परिचित करना चाहता हूँ जिससे मिलकर आप शांत आनंदित प्रसन्न हो कर जीबन जी सकते है ,इसे जागरण तो नहीं पर जागरण के बहुत निकट की अबस्था कहा जासकता है ,और अगर मेरे कोई मित्र जग जाये तो क्या बात है आनंद ही आनंद
स्वामी सच्चिदानंद परमहंस
स्वामी सच्चिदानंद परमहंस
Vaidic Kaal Gadana (Time Calculation)
हिन्दू धर्म के अनुसार सृष्टिकर्ता ब्रह्मा होते हैं। इनकी आयु इन्हीं के सौ वर्षों के बराबर होती है। इनकी आयु १००० महायुगों के बराबर होती है। विष्णु पुराण के अनुसार काल-गणना विभाग, विष्णु पुराण भाग १, तॄतीय अध्याय
के अनुसार:
2 अयन (छः मास अवधि, ऊपर देखें) = 360 मानव वर्ष = एक दिव्य वर्ष
4,000 + 400 + 400 = 4,800 दिव्य वर्ष = 1 कॄत युग
3,000 + 300 + 300 = 3,600 दिव्य वर्ष = 1 त्रेता युग
2,000 + 200 + 200 = 2,400 दिव्य वर्ष = 1 द्वापर युग
1,000 + 100 + 100 = 1,200 दिव्य वर्ष = 1 कलि युग
12,000 दिव्य वर्ष = 4 युग = 1 महायुग (दिव्य युग भी कहते हैं)
ब्रह्मा की काल गणना
1000 महायुग= 1 कल्प = ब्रह्मा का 1 दिवस (केवल दिन) (चार खरब बत्तीस अरब मानव वर्ष; और यहू सूर्य की खगोलीय वैज्ञानिक आयु भी है).
(दो कल्प ब्रह्मा के एक दिन और रात बनाते हैं)
30 ब्रह्मा के दिन = 1 ब्रह्मा का मास (दो खरब 59 अरब 20 करोड़ मानव वर्ष)
12 ब्रह्मा के मास = 1 ब्रह्मा के वर्ष (31 खरब 10 अरब 4 करोड़ मानव वर्ष)
50 ब्रह्मा के वर्ष = 1 परार्ध
2 परार्ध= 100 ब्रह्मा के वर्ष= 1 महाकल्प (ब्रह्मा का जीवन काल)(31 शंख 10 खरब 40अरब मानव वर्ष)
ब्रह्मा का एक दिवस 10,000 भागों में बंटा होता है, जिसे चरण कहते हैं:
चारों युग 4 चरण (1,728,000 सौर वर्ष) सत युग
3 चरण (1,296,000 सौर वर्ष) त्रेता युग
2 चरण (864,000 सौर वर्ष) द्वापर युग
1 चरण (432,000 सौर वर्ष) कलि युग
यह चक्र ऐसे दोहराता रहता है, कि ब्रह्मा के एक दिवस में 1000 महायुग हो जाते हैं
एक उपरोक्त युगों का चक्र = एक महायुग (43 लाख 20 हजार सौर वर्ष)
श्रीमद्भग्वदगीता के अनुसार "सहस्र-युग अहर-यद ब्रह्मणो विदुः", अर्थात ब्रह्मा का एक दिवस = 1000 महायुग. इसके अनुसार ब्रह्मा का एक दिवस = 4 अरब 32 खरब सौर वर्ष. इसी प्रकार इतनी ही अवधि ब्रह्मा की रात्रि की भी है.
एक मन्वन्तर में 71 महायुग (306,720,000 सौर वर्ष) होते हैं. प्रत्येक मन्वन्तर के शासक एक मनु होते हैं.
प्रत्येक मन्वन्तर के बाद, एक संधि-काल होता है, जो कि कॄतयुग के बराबर का होता है (1,728,000 = 4 चरण) (इस संधि-काल में प्रलय होने से पूर्ण पॄथ्वी जलमग्न हो जाती है.)
एक कल्प में 1,728,000 सौर वर्ष होते हैं, जिसे आदि संधि कहते हैं, जिसके बाद 14 मन्वन्तर और संधि काल आते हैं
ब्रह्मा का एक दिन बराबर है:
(14 गुणा 71 महायुग) + (15 x 4 चरण)
= 994 महायुग + (60 चरण)
= 994 महायुग + (6 x 10) चरण
= 994 महायुग + 6 महायुग
के अनुसार:
2 अयन (छः मास अवधि, ऊपर देखें) = 360 मानव वर्ष = एक दिव्य वर्ष
4,000 + 400 + 400 = 4,800 दिव्य वर्ष = 1 कॄत युग
3,000 + 300 + 300 = 3,600 दिव्य वर्ष = 1 त्रेता युग
2,000 + 200 + 200 = 2,400 दिव्य वर्ष = 1 द्वापर युग
1,000 + 100 + 100 = 1,200 दिव्य वर्ष = 1 कलि युग
12,000 दिव्य वर्ष = 4 युग = 1 महायुग (दिव्य युग भी कहते हैं)
ब्रह्मा की काल गणना
1000 महायुग= 1 कल्प = ब्रह्मा का 1 दिवस (केवल दिन) (चार खरब बत्तीस अरब मानव वर्ष; और यहू सूर्य की खगोलीय वैज्ञानिक आयु भी है).
(दो कल्प ब्रह्मा के एक दिन और रात बनाते हैं)
30 ब्रह्मा के दिन = 1 ब्रह्मा का मास (दो खरब 59 अरब 20 करोड़ मानव वर्ष)
12 ब्रह्मा के मास = 1 ब्रह्मा के वर्ष (31 खरब 10 अरब 4 करोड़ मानव वर्ष)
50 ब्रह्मा के वर्ष = 1 परार्ध
2 परार्ध= 100 ब्रह्मा के वर्ष= 1 महाकल्प (ब्रह्मा का जीवन काल)(31 शंख 10 खरब 40अरब मानव वर्ष)
ब्रह्मा का एक दिवस 10,000 भागों में बंटा होता है, जिसे चरण कहते हैं:
चारों युग 4 चरण (1,728,000 सौर वर्ष) सत युग
3 चरण (1,296,000 सौर वर्ष) त्रेता युग
2 चरण (864,000 सौर वर्ष) द्वापर युग
1 चरण (432,000 सौर वर्ष) कलि युग
यह चक्र ऐसे दोहराता रहता है, कि ब्रह्मा के एक दिवस में 1000 महायुग हो जाते हैं
एक उपरोक्त युगों का चक्र = एक महायुग (43 लाख 20 हजार सौर वर्ष)
श्रीमद्भग्वदगीता के अनुसार "सहस्र-युग अहर-यद ब्रह्मणो विदुः", अर्थात ब्रह्मा का एक दिवस = 1000 महायुग. इसके अनुसार ब्रह्मा का एक दिवस = 4 अरब 32 खरब सौर वर्ष. इसी प्रकार इतनी ही अवधि ब्रह्मा की रात्रि की भी है.
एक मन्वन्तर में 71 महायुग (306,720,000 सौर वर्ष) होते हैं. प्रत्येक मन्वन्तर के शासक एक मनु होते हैं.
प्रत्येक मन्वन्तर के बाद, एक संधि-काल होता है, जो कि कॄतयुग के बराबर का होता है (1,728,000 = 4 चरण) (इस संधि-काल में प्रलय होने से पूर्ण पॄथ्वी जलमग्न हो जाती है.)
एक कल्प में 1,728,000 सौर वर्ष होते हैं, जिसे आदि संधि कहते हैं, जिसके बाद 14 मन्वन्तर और संधि काल आते हैं
ब्रह्मा का एक दिन बराबर है:
(14 गुणा 71 महायुग) + (15 x 4 चरण)
= 994 महायुग + (60 चरण)
= 994 महायुग + (6 x 10) चरण
= 994 महायुग + 6 महायुग
Thursday, March 1, 2012
The Two Dimensions Of Being A Detached Observer (FB)
The Two Dimensions Of Being A Detached Observer
There are two dimensions of being a detached observer - the inner dimension and the outer one.
Let us look at the inner dimension of detached observation. It is the ability or the technique to stand back from or observe in a detached way our own thoughts, feelings, emotions, attitudes and behavior. We are creators and our thoughts, feelings, emotions and attitudes are our creation. In fact, this is the first step to becoming a ruler of the self and making the self powerful. If we fail to detach from our thoughts and emotions then they will be our masters, they will go out of control and will, as a result, leak away or waste our energy. Practice simply being the witness of whatever you are thinking and feeling. This is an important aspect ...of any good spiritual practice and after a while you will find it an experience that both, frees you and empowers you.
The external dimension of detached observation is the technique of being a witness to or an observer of the scenes, of the world around us. As we stand back and watch the scenes of life being played, on the world stage around us, without being actively involved, we can see the 'big picture' more clearly. This makes it easier to judge clearly what is the most suitable contribution that we can make and the most suitable role we can play - through our thoughts, words and actions.
There are two dimensions of being a detached observer - the inner dimension and the outer one.
Let us look at the inner dimension of detached observation. It is the ability or the technique to stand back from or observe in a detached way our own thoughts, feelings, emotions, attitudes and behavior. We are creators and our thoughts, feelings, emotions and attitudes are our creation. In fact, this is the first step to becoming a ruler of the self and making the self powerful. If we fail to detach from our thoughts and emotions then they will be our masters, they will go out of control and will, as a result, leak away or waste our energy. Practice simply being the witness of whatever you are thinking and feeling. This is an important aspect ...of any good spiritual practice and after a while you will find it an experience that both, frees you and empowers you.
The external dimension of detached observation is the technique of being a witness to or an observer of the scenes, of the world around us. As we stand back and watch the scenes of life being played, on the world stage around us, without being actively involved, we can see the 'big picture' more clearly. This makes it easier to judge clearly what is the most suitable contribution that we can make and the most suitable role we can play - through our thoughts, words and actions.
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