प्यारे मित्रों आदमी अपने आप को नहीं जानता इसलिए ,आखोवाला अंधा है ,टटोल टटोल कर दूसरों के बनाये मार्ग पर चल रहा है उसका कोई निजी अनुभव धर्म के मार्ग में नहीं है ,उसकी जीबन धारा बाहर की तरफ ही बह रही है ,उसकी सारी इन्द्रियाँ बाहर का मार्ग बताती है ,बह सब कुछ बाहर ही खोजता है ,धन ,पदार्थ ,सुख , काम ,धर्म ,बाहर के मूर्छा में उसे अपने अंदर मोजूद परमात्मा का कुछ अता-पता नहीं है ,शान्ती भी बाहर खोजता है ...मृगतृष्णा की तरह ,आनद भी बाहर खोजता है जैसे कुत्ते को सूखी हड्डी चबाने में आनंद मिलता है जबकि उसके मसूड़े से आने बाला खून उसे हड्डी से आता लगता है ,अच्छे अच्छे बिद्बन भी इस माया से सम्मोहित है ,पूरा जीबन ख्याति ,प्रतिस्ठा पाने मै खो देते है अपने आप को पा ही नहीं पाते ,और तो और आपने आपको पाना भी कुछ है ये भी नहीं जानते . बाहर का बहाव संसार है चाहे आप कुछ भी करे ,माया है ,अंदर की यात्रा धर्म है ,जो आपको अशान्त करे बह अधरर्म है ,जो शांती दे बो धर्म है नशे की शांती नही, गहरी बात है हल्के से मत लेना ,बाहर कुछ करना तो बहुत सरल है कृत्य सदा सरल है अंदर अकृत्य मै ठहरना कठिन है ,जिसको आप जीबन मान बैठे हो बो तो जीबन का अधिस्ठआन है जीबन का आधार तो जाना ही नहीं बही धर्म है ,क्योकि बह आपको धारण करता है ,समस्त धर्म बाहर धकेल रहे है इसलिए आदमी धर्म के आधार से बंचित है अन्जान है ,मै उसी आधार से अपने मित्रों को मिलाना चाहता हूँ परिचित करना चाहता हूँ जिससे मिलकर आप शांत आनंदित प्रसन्न हो कर जीबन जी सकते है ,इसे जागरण तो नहीं पर जागरण के बहुत निकट की अबस्था कहा जासकता है ,और अगर मेरे कोई मित्र जग जाये तो क्या बात है आनंद ही आनंद
स्वामी सच्चिदानंद परमहंस
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