नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मे "न" काराय नमः शिवायः॥
मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय।
मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मे "म" काराय नमः शिवायः॥
शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय|
श्री नीलकंठाय वृषभद्धजाय तस्मै "शि" काराय नमः शिवायः॥
वषिष्ठ कुभोदव गौतमाय मुनींद्र देवार्चित शेखराय।
चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय तस्मै "व" काराय नमः शिवायः॥
यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय|
दिव्याय देवाय दिगंबराय तस्मै "य" काराय नमः शिवायः॥
पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेत शिव सन्निधौ|
शिवलोकं वाप्नोति शिवेन सह मोदते॥
Tuesday, March 13, 2012
आर्य और द्रविड़ दोनों गुण वाचक शब्द है ,जाति वाचक नहीं
--------------------------------इतिहास -(५}----------------------------------------
आर्य और द्रविड़ दोनों गुण वाचक शब्द है ,जाति वाचक नहीं । परन्तु ब्रिटिश इतिहासकारों ने इनका जातिवाचक प्रयोग कर देश में विखराव पैदा कर दिया।यह वैसा ही शरारती कारनामा था जैसा राम जन्मभूमि आन्दोलन केसमय अर्जुन सिंह ने किया था ।सहमत (सफ़दर हाशमी मेमोरिअल ट्रस्ट )द्वारा अयोध्या में एक पोस्टर में -राम ने जनक (फादर )सुता (डाटर)से विवाह किया का अनुवाद अर्जुन सिंह के चहेतों ने किया राम मेरीड हिज फादर्स डाटर ।अंग्रेजो और काले अंग्रेजो में कैसी समानता है ।
आर्य का अर्थ है सुसभ्य ,सुसंस्कृत ।सभी वैदिक विद्वान् यही अर्थ करते है ।
प्रियं माँ क्रनु देवेसु प्रियं राजसु माँ कृधि
प्रियं सर्वत्र पश्यत इत शूद्रे उत आर्ये द्रविड़ अर्थ होता है धन संपत्ति हम भगवान को द्रविड़ कहते है -त्वमेव विद्या द्रविड़म त्वमेव ।
उत्तर के लोग दक्षिण वालो को द्रविड़इसलिए कहते थे क्यों कि दक्षिण वालो ने कभी लोहे के पानी का स्वाद नहीं चखा ।विदेशी आक्रान्ताओ ने विन्द्याचल के नीचे लूटमार नहीं की। सोने की एक मात्र खान दक्षिण भारत में ,हीरो की खाने दक्षिण में ,मसाले दक्षिण में ,बार बार आक्रमण न होने से राजनीतिक स्थिरता एवं शांति के कारण निर्वाध व्यापार ।इस कारण दक्षिण भारतीय द्रविड़ कहलाते थे ।वे धनाड्य थे जाति नहीं ।क्रमशः ----
आर्य और द्रविड़ दोनों गुण वाचक शब्द है ,जाति वाचक नहीं । परन्तु ब्रिटिश इतिहासकारों ने इनका जातिवाचक प्रयोग कर देश में विखराव पैदा कर दिया।यह वैसा ही शरारती कारनामा था जैसा राम जन्मभूमि आन्दोलन केसमय अर्जुन सिंह ने किया था ।सहमत (सफ़दर हाशमी मेमोरिअल ट्रस्ट )द्वारा अयोध्या में एक पोस्टर में -राम ने जनक (फादर )सुता (डाटर)से विवाह किया का अनुवाद अर्जुन सिंह के चहेतों ने किया राम मेरीड हिज फादर्स डाटर ।अंग्रेजो और काले अंग्रेजो में कैसी समानता है ।
आर्य का अर्थ है सुसभ्य ,सुसंस्कृत ।सभी वैदिक विद्वान् यही अर्थ करते है ।
प्रियं माँ क्रनु देवेसु प्रियं राजसु माँ कृधि
प्रियं सर्वत्र पश्यत इत शूद्रे उत आर्ये द्रविड़ अर्थ होता है धन संपत्ति हम भगवान को द्रविड़ कहते है -त्वमेव विद्या द्रविड़म त्वमेव ।
उत्तर के लोग दक्षिण वालो को द्रविड़इसलिए कहते थे क्यों कि दक्षिण वालो ने कभी लोहे के पानी का स्वाद नहीं चखा ।विदेशी आक्रान्ताओ ने विन्द्याचल के नीचे लूटमार नहीं की। सोने की एक मात्र खान दक्षिण भारत में ,हीरो की खाने दक्षिण में ,मसाले दक्षिण में ,बार बार आक्रमण न होने से राजनीतिक स्थिरता एवं शांति के कारण निर्वाध व्यापार ।इस कारण दक्षिण भारतीय द्रविड़ कहलाते थे ।वे धनाड्य थे जाति नहीं ।क्रमशः ----
Wednesday, March 7, 2012
अपनी भारत की संस्कृति को पहचाने
अपनी भारत की संस्कृति को पहचाने --- दो पक्ष - कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष ! तीन ऋण - देव ऋण, पित्र ऋण एवं ऋषि त्रण ! चार युग - सतयुग , त्रेता युग , द्वापरयुग एवं कलयुग ! चार धाम - द्वारिका , बद्रीनाथ, जगन्नाथ पूरी एवं रामेश्वरम
धाम ! चारपीठ - शारदा पीठ ( द्वारिका ), ज्योतिष पीठ
( जोशीमठ बद्रिधाम), गोवर्धन पीठ ( जगन्नाथपुरी ) एवं
श्रन्गेरिपीठ ! चर वेद- ऋग्वेद , अथर्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद ! चार आश्रम - ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , बानप्रस्थ एवं संन्यास ! चार अंतःकरण - मन , बुद्धि , चित्त , एवं अहंकार ! पञ्च गव्य - गाय का घी , दूध , दही , गोमूत्र एवं गोबर , ! पञ्च देव - गणेश , विष्णु , शिव , देवी और सूर्य ! पंच तत्त्व - प्रथ्वी , जल , अग्नि , वायु एवं आकाश ! छह दर्शन - वैशेषिक , न्याय , सांख्य, योग , पूर्व मिसांसा एवं
दक्षिण मिसांसा ! सप्त ऋषि - विश्वामित्र , जमदाग्नि , भरद्वाज , गौतम ,
... अत्री , वशिष्ठ और कश्यप ! सप्त पूरी - अयोध्या पूरी , मथुरा पूरी , माया पूरी ( हरिद्वार ) ,
कशी , कांची ( शिन कांची - विष्णु कांची ) , अवंतिका और
द्वारिका पूरी ! आठ योग - यम , नियम, आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार ,
धारणा , ध्यान एवं समाधी ! आठ लक्ष्मी - आग्घ , विद्या , सौभाग्य , अमृत , काम , सत्य ,
भोग , एवं योग लक्ष्मी ! नव दुर्गा - शैल पुत्री , ब्रह्मचारिणी , चंद्रघंटा , कुष्मांडा ,
स्कंदमाता , कात्यायिनी , कालरात्रि , महागौरी एवं
सिद्धिदात्री ! दस दिशाएं - पूर्व , पश्चिम , उत्तर , दक्षिण , इशान ,
नेत्रत्य , वायव्य आग्नेय ,आकाश एवं पाताल ! मुख्या ग्यारह अवतार - मत्स्य , कच्छप , बराह , नरसिंह ,
बामन , परशुराम , श्री राम , कृष्ण , बलराम , बुद्ध , एवं कल्कि ! बारह मास - चेत्र , वैशाख , ज्येष्ठ ,अषाड़ , श्रावन , भाद्रपद ,
अश्विन , कार्तिक , मार्गशीर्ष . पौष , माघ , फागुन ! बारह राशी - मेष , ब्रषभ , मिथुन , कर्क , सिंह , तुला ,
ब्रश्चिक , धनु , मकर , कुम्भ , एवं कन्या ! बारह ज्योतिर्लिंग - सोमनाथ , मल्लिकर्जुना , महाकाल ,
ओमकालेश्वर , बैजनाथ , रामेश्वरम , विश्वनाथ ,
त्रियम्वाकेश्वर , केदारनाथ , घुष्नेश्वर , भीमाशंकर एवं
नागेश्वर ! पंद्रह तिथियाँ - प्रतिपदा , द्वतीय , तृतीय , चतुर्थी ,
पंचमी , षष्ठी , सप्तमी , अष्टमी , नवमी , दशमी , एकादशी ,
द्वादशी , त्रयोदशी , चतुर्दशी , पूर्णिमा , अमावश्या ! स्म्रतियां - मनु , विष्णु, अत्री , हारीत , याज्ञवल्क्य ,
उशना , अंगीरा , यम , आपस्तम्ब , सर्वत , कात्यायन ,
ब्रहस्पति , पराशर , व्यास , शांख्य , लिखित , दक्ष ,
शातातप , वशिष्ठ !
धाम ! चारपीठ - शारदा पीठ ( द्वारिका ), ज्योतिष पीठ
( जोशीमठ बद्रिधाम), गोवर्धन पीठ ( जगन्नाथपुरी ) एवं
श्रन्गेरिपीठ ! चर वेद- ऋग्वेद , अथर्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद ! चार आश्रम - ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , बानप्रस्थ एवं संन्यास ! चार अंतःकरण - मन , बुद्धि , चित्त , एवं अहंकार ! पञ्च गव्य - गाय का घी , दूध , दही , गोमूत्र एवं गोबर , ! पञ्च देव - गणेश , विष्णु , शिव , देवी और सूर्य ! पंच तत्त्व - प्रथ्वी , जल , अग्नि , वायु एवं आकाश ! छह दर्शन - वैशेषिक , न्याय , सांख्य, योग , पूर्व मिसांसा एवं
दक्षिण मिसांसा ! सप्त ऋषि - विश्वामित्र , जमदाग्नि , भरद्वाज , गौतम ,
... अत्री , वशिष्ठ और कश्यप ! सप्त पूरी - अयोध्या पूरी , मथुरा पूरी , माया पूरी ( हरिद्वार ) ,
कशी , कांची ( शिन कांची - विष्णु कांची ) , अवंतिका और
द्वारिका पूरी ! आठ योग - यम , नियम, आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार ,
धारणा , ध्यान एवं समाधी ! आठ लक्ष्मी - आग्घ , विद्या , सौभाग्य , अमृत , काम , सत्य ,
भोग , एवं योग लक्ष्मी ! नव दुर्गा - शैल पुत्री , ब्रह्मचारिणी , चंद्रघंटा , कुष्मांडा ,
स्कंदमाता , कात्यायिनी , कालरात्रि , महागौरी एवं
सिद्धिदात्री ! दस दिशाएं - पूर्व , पश्चिम , उत्तर , दक्षिण , इशान ,
नेत्रत्य , वायव्य आग्नेय ,आकाश एवं पाताल ! मुख्या ग्यारह अवतार - मत्स्य , कच्छप , बराह , नरसिंह ,
बामन , परशुराम , श्री राम , कृष्ण , बलराम , बुद्ध , एवं कल्कि ! बारह मास - चेत्र , वैशाख , ज्येष्ठ ,अषाड़ , श्रावन , भाद्रपद ,
अश्विन , कार्तिक , मार्गशीर्ष . पौष , माघ , फागुन ! बारह राशी - मेष , ब्रषभ , मिथुन , कर्क , सिंह , तुला ,
ब्रश्चिक , धनु , मकर , कुम्भ , एवं कन्या ! बारह ज्योतिर्लिंग - सोमनाथ , मल्लिकर्जुना , महाकाल ,
ओमकालेश्वर , बैजनाथ , रामेश्वरम , विश्वनाथ ,
त्रियम्वाकेश्वर , केदारनाथ , घुष्नेश्वर , भीमाशंकर एवं
नागेश्वर ! पंद्रह तिथियाँ - प्रतिपदा , द्वतीय , तृतीय , चतुर्थी ,
पंचमी , षष्ठी , सप्तमी , अष्टमी , नवमी , दशमी , एकादशी ,
द्वादशी , त्रयोदशी , चतुर्दशी , पूर्णिमा , अमावश्या ! स्म्रतियां - मनु , विष्णु, अत्री , हारीत , याज्ञवल्क्य ,
उशना , अंगीरा , यम , आपस्तम्ब , सर्वत , कात्यायन ,
ब्रहस्पति , पराशर , व्यास , शांख्य , लिखित , दक्ष ,
शातातप , वशिष्ठ !
Friday, March 2, 2012
What is your nature(स्वभाव)? Swine like or Swan like? (FB)
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What is your nature(स्वभाव)? Swine like or Swan like?
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... Some people have swine tendency of interacting with environment. Like swine, they cannot distinguish between mud and matter of concern and intake everything. They read everything. They watch everything. They talk on everything. Good, bad, grotesque – don’t matter to them. Perceptions created by muddy inputs – don’t matter to them. They love to remain chaos and diseased state. Mutations are normal conditions for them.
Strikingly different, unlike swine, some have Swan tendency. They are skilled in identifying pollutants and stay away from pollutants. They remain in company of good. They ignore bad. They have discrimination power.
**How do you eat? Like swine (Fast food, trite food) or swan (Satvik ,pure, fresh and nutritive food, irrespective of tastes)?
**How do you breathe? Like swine (irregular, unscientific) or like Swan (Rhythmic, scientific, accordance with nature of respiratory system)
**What do read? Like swine (anything, junk newspapers, gossip crap on page 3) or like swan (editorials, research papers)?
**What do you watch? Like swine (anything and everything that comes on channels, Cricket (or Football) or like Swan (Selective, helpful, light entertainment which cannot carry your mind out after watching)?
Intake determines perceptions. Enquire before intake. Like swan, unlike swine.
An endless science, as we know, is grammar.
And life is short; the hindrances are many.
Essentials keep, leaving the non-essential,
As swans drink up the milk, but leave the water
-पंचतंत्र
" By him who is free from passion what is to be left [i. e. Nature] is left, and what is to be taken [i. e. Soul] is taken; as in the case of the swan and the milk."'
- Samkhya aphorism
"Others see not the difference when water is mixed with milk, but the
swan at once separates the milk and the water; so too when the
souls are absorbed in the supreme Brahman, the Lord,-the faithful,
who have received the Guru's words, can at once draw a difference between them."
-Tattva Muktavali
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेत: तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीर: |
श्रेयो हि धीरोभिप्रेयसो वॄणीते प्रेयो मन्दो षोगक्षेमाद् वॄणीते ||
-कठ उपनिषद्
Both the good (Shreyas) and the pleasant (Preyas) approch the man. The wise man pondering over them, makes his choice. The wise(Swan) chooses the good (Shreyas) in preference to the pleasant (Preyas). The fool (simple-minded swine) for the sake of worldly-being prefers the pleasant (preyas)
-Katha Upanishad
This is the reason; iconography of Maa Saraswati – goddess of knowledge – is not completed without swan – the discriminative ability described by Bhagwad Gita.
===================
The aquatic bird swan lives on lakes that abound in lotuses, and subsists in a measure upon the underground stalk of the lotus plant (such a stalk is called bisa), whose joint (granthi), when crushed (bhagna), exudes a juice designated by the word ksira, which is also a common name for milk. Thus the bird, as it floats on the lake, may be said to drink ksira or milk out of water.
What is your nature(स्वभाव)? Swine like or Swan like?
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... Some people have swine tendency of interacting with environment. Like swine, they cannot distinguish between mud and matter of concern and intake everything. They read everything. They watch everything. They talk on everything. Good, bad, grotesque – don’t matter to them. Perceptions created by muddy inputs – don’t matter to them. They love to remain chaos and diseased state. Mutations are normal conditions for them.
Strikingly different, unlike swine, some have Swan tendency. They are skilled in identifying pollutants and stay away from pollutants. They remain in company of good. They ignore bad. They have discrimination power.
**How do you eat? Like swine (Fast food, trite food) or swan (Satvik ,pure, fresh and nutritive food, irrespective of tastes)?
**How do you breathe? Like swine (irregular, unscientific) or like Swan (Rhythmic, scientific, accordance with nature of respiratory system)
**What do read? Like swine (anything, junk newspapers, gossip crap on page 3) or like swan (editorials, research papers)?
**What do you watch? Like swine (anything and everything that comes on channels, Cricket (or Football) or like Swan (Selective, helpful, light entertainment which cannot carry your mind out after watching)?
Intake determines perceptions. Enquire before intake. Like swan, unlike swine.
An endless science, as we know, is grammar.
And life is short; the hindrances are many.
Essentials keep, leaving the non-essential,
As swans drink up the milk, but leave the water
-पंचतंत्र
" By him who is free from passion what is to be left [i. e. Nature] is left, and what is to be taken [i. e. Soul] is taken; as in the case of the swan and the milk."'
- Samkhya aphorism
"Others see not the difference when water is mixed with milk, but the
swan at once separates the milk and the water; so too when the
souls are absorbed in the supreme Brahman, the Lord,-the faithful,
who have received the Guru's words, can at once draw a difference between them."
-Tattva Muktavali
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेत: तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीर: |
श्रेयो हि धीरोभिप्रेयसो वॄणीते प्रेयो मन्दो षोगक्षेमाद् वॄणीते ||
-कठ उपनिषद्
Both the good (Shreyas) and the pleasant (Preyas) approch the man. The wise man pondering over them, makes his choice. The wise(Swan) chooses the good (Shreyas) in preference to the pleasant (Preyas). The fool (simple-minded swine) for the sake of worldly-being prefers the pleasant (preyas)
-Katha Upanishad
This is the reason; iconography of Maa Saraswati – goddess of knowledge – is not completed without swan – the discriminative ability described by Bhagwad Gita.
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The aquatic bird swan lives on lakes that abound in lotuses, and subsists in a measure upon the underground stalk of the lotus plant (such a stalk is called bisa), whose joint (granthi), when crushed (bhagna), exudes a juice designated by the word ksira, which is also a common name for milk. Thus the bird, as it floats on the lake, may be said to drink ksira or milk out of water.
Real purpose of LIfe!
प्यारे मित्रों आदमी अपने आप को नहीं जानता इसलिए ,आखोवाला अंधा है ,टटोल टटोल कर दूसरों के बनाये मार्ग पर चल रहा है उसका कोई निजी अनुभव धर्म के मार्ग में नहीं है ,उसकी जीबन धारा बाहर की तरफ ही बह रही है ,उसकी सारी इन्द्रियाँ बाहर का मार्ग बताती है ,बह सब कुछ बाहर ही खोजता है ,धन ,पदार्थ ,सुख , काम ,धर्म ,बाहर के मूर्छा में उसे अपने अंदर मोजूद परमात्मा का कुछ अता-पता नहीं है ,शान्ती भी बाहर खोजता है ...मृगतृष्णा की तरह ,आनद भी बाहर खोजता है जैसे कुत्ते को सूखी हड्डी चबाने में आनंद मिलता है जबकि उसके मसूड़े से आने बाला खून उसे हड्डी से आता लगता है ,अच्छे अच्छे बिद्बन भी इस माया से सम्मोहित है ,पूरा जीबन ख्याति ,प्रतिस्ठा पाने मै खो देते है अपने आप को पा ही नहीं पाते ,और तो और आपने आपको पाना भी कुछ है ये भी नहीं जानते . बाहर का बहाव संसार है चाहे आप कुछ भी करे ,माया है ,अंदर की यात्रा धर्म है ,जो आपको अशान्त करे बह अधरर्म है ,जो शांती दे बो धर्म है नशे की शांती नही, गहरी बात है हल्के से मत लेना ,बाहर कुछ करना तो बहुत सरल है कृत्य सदा सरल है अंदर अकृत्य मै ठहरना कठिन है ,जिसको आप जीबन मान बैठे हो बो तो जीबन का अधिस्ठआन है जीबन का आधार तो जाना ही नहीं बही धर्म है ,क्योकि बह आपको धारण करता है ,समस्त धर्म बाहर धकेल रहे है इसलिए आदमी धर्म के आधार से बंचित है अन्जान है ,मै उसी आधार से अपने मित्रों को मिलाना चाहता हूँ परिचित करना चाहता हूँ जिससे मिलकर आप शांत आनंदित प्रसन्न हो कर जीबन जी सकते है ,इसे जागरण तो नहीं पर जागरण के बहुत निकट की अबस्था कहा जासकता है ,और अगर मेरे कोई मित्र जग जाये तो क्या बात है आनंद ही आनंद
स्वामी सच्चिदानंद परमहंस
स्वामी सच्चिदानंद परमहंस
Vaidic Kaal Gadana (Time Calculation)
हिन्दू धर्म के अनुसार सृष्टिकर्ता ब्रह्मा होते हैं। इनकी आयु इन्हीं के सौ वर्षों के बराबर होती है। इनकी आयु १००० महायुगों के बराबर होती है। विष्णु पुराण के अनुसार काल-गणना विभाग, विष्णु पुराण भाग १, तॄतीय अध्याय
के अनुसार:
2 अयन (छः मास अवधि, ऊपर देखें) = 360 मानव वर्ष = एक दिव्य वर्ष
4,000 + 400 + 400 = 4,800 दिव्य वर्ष = 1 कॄत युग
3,000 + 300 + 300 = 3,600 दिव्य वर्ष = 1 त्रेता युग
2,000 + 200 + 200 = 2,400 दिव्य वर्ष = 1 द्वापर युग
1,000 + 100 + 100 = 1,200 दिव्य वर्ष = 1 कलि युग
12,000 दिव्य वर्ष = 4 युग = 1 महायुग (दिव्य युग भी कहते हैं)
ब्रह्मा की काल गणना
1000 महायुग= 1 कल्प = ब्रह्मा का 1 दिवस (केवल दिन) (चार खरब बत्तीस अरब मानव वर्ष; और यहू सूर्य की खगोलीय वैज्ञानिक आयु भी है).
(दो कल्प ब्रह्मा के एक दिन और रात बनाते हैं)
30 ब्रह्मा के दिन = 1 ब्रह्मा का मास (दो खरब 59 अरब 20 करोड़ मानव वर्ष)
12 ब्रह्मा के मास = 1 ब्रह्मा के वर्ष (31 खरब 10 अरब 4 करोड़ मानव वर्ष)
50 ब्रह्मा के वर्ष = 1 परार्ध
2 परार्ध= 100 ब्रह्मा के वर्ष= 1 महाकल्प (ब्रह्मा का जीवन काल)(31 शंख 10 खरब 40अरब मानव वर्ष)
ब्रह्मा का एक दिवस 10,000 भागों में बंटा होता है, जिसे चरण कहते हैं:
चारों युग 4 चरण (1,728,000 सौर वर्ष) सत युग
3 चरण (1,296,000 सौर वर्ष) त्रेता युग
2 चरण (864,000 सौर वर्ष) द्वापर युग
1 चरण (432,000 सौर वर्ष) कलि युग
यह चक्र ऐसे दोहराता रहता है, कि ब्रह्मा के एक दिवस में 1000 महायुग हो जाते हैं
एक उपरोक्त युगों का चक्र = एक महायुग (43 लाख 20 हजार सौर वर्ष)
श्रीमद्भग्वदगीता के अनुसार "सहस्र-युग अहर-यद ब्रह्मणो विदुः", अर्थात ब्रह्मा का एक दिवस = 1000 महायुग. इसके अनुसार ब्रह्मा का एक दिवस = 4 अरब 32 खरब सौर वर्ष. इसी प्रकार इतनी ही अवधि ब्रह्मा की रात्रि की भी है.
एक मन्वन्तर में 71 महायुग (306,720,000 सौर वर्ष) होते हैं. प्रत्येक मन्वन्तर के शासक एक मनु होते हैं.
प्रत्येक मन्वन्तर के बाद, एक संधि-काल होता है, जो कि कॄतयुग के बराबर का होता है (1,728,000 = 4 चरण) (इस संधि-काल में प्रलय होने से पूर्ण पॄथ्वी जलमग्न हो जाती है.)
एक कल्प में 1,728,000 सौर वर्ष होते हैं, जिसे आदि संधि कहते हैं, जिसके बाद 14 मन्वन्तर और संधि काल आते हैं
ब्रह्मा का एक दिन बराबर है:
(14 गुणा 71 महायुग) + (15 x 4 चरण)
= 994 महायुग + (60 चरण)
= 994 महायुग + (6 x 10) चरण
= 994 महायुग + 6 महायुग
के अनुसार:
2 अयन (छः मास अवधि, ऊपर देखें) = 360 मानव वर्ष = एक दिव्य वर्ष
4,000 + 400 + 400 = 4,800 दिव्य वर्ष = 1 कॄत युग
3,000 + 300 + 300 = 3,600 दिव्य वर्ष = 1 त्रेता युग
2,000 + 200 + 200 = 2,400 दिव्य वर्ष = 1 द्वापर युग
1,000 + 100 + 100 = 1,200 दिव्य वर्ष = 1 कलि युग
12,000 दिव्य वर्ष = 4 युग = 1 महायुग (दिव्य युग भी कहते हैं)
ब्रह्मा की काल गणना
1000 महायुग= 1 कल्प = ब्रह्मा का 1 दिवस (केवल दिन) (चार खरब बत्तीस अरब मानव वर्ष; और यहू सूर्य की खगोलीय वैज्ञानिक आयु भी है).
(दो कल्प ब्रह्मा के एक दिन और रात बनाते हैं)
30 ब्रह्मा के दिन = 1 ब्रह्मा का मास (दो खरब 59 अरब 20 करोड़ मानव वर्ष)
12 ब्रह्मा के मास = 1 ब्रह्मा के वर्ष (31 खरब 10 अरब 4 करोड़ मानव वर्ष)
50 ब्रह्मा के वर्ष = 1 परार्ध
2 परार्ध= 100 ब्रह्मा के वर्ष= 1 महाकल्प (ब्रह्मा का जीवन काल)(31 शंख 10 खरब 40अरब मानव वर्ष)
ब्रह्मा का एक दिवस 10,000 भागों में बंटा होता है, जिसे चरण कहते हैं:
चारों युग 4 चरण (1,728,000 सौर वर्ष) सत युग
3 चरण (1,296,000 सौर वर्ष) त्रेता युग
2 चरण (864,000 सौर वर्ष) द्वापर युग
1 चरण (432,000 सौर वर्ष) कलि युग
यह चक्र ऐसे दोहराता रहता है, कि ब्रह्मा के एक दिवस में 1000 महायुग हो जाते हैं
एक उपरोक्त युगों का चक्र = एक महायुग (43 लाख 20 हजार सौर वर्ष)
श्रीमद्भग्वदगीता के अनुसार "सहस्र-युग अहर-यद ब्रह्मणो विदुः", अर्थात ब्रह्मा का एक दिवस = 1000 महायुग. इसके अनुसार ब्रह्मा का एक दिवस = 4 अरब 32 खरब सौर वर्ष. इसी प्रकार इतनी ही अवधि ब्रह्मा की रात्रि की भी है.
एक मन्वन्तर में 71 महायुग (306,720,000 सौर वर्ष) होते हैं. प्रत्येक मन्वन्तर के शासक एक मनु होते हैं.
प्रत्येक मन्वन्तर के बाद, एक संधि-काल होता है, जो कि कॄतयुग के बराबर का होता है (1,728,000 = 4 चरण) (इस संधि-काल में प्रलय होने से पूर्ण पॄथ्वी जलमग्न हो जाती है.)
एक कल्प में 1,728,000 सौर वर्ष होते हैं, जिसे आदि संधि कहते हैं, जिसके बाद 14 मन्वन्तर और संधि काल आते हैं
ब्रह्मा का एक दिन बराबर है:
(14 गुणा 71 महायुग) + (15 x 4 चरण)
= 994 महायुग + (60 चरण)
= 994 महायुग + (6 x 10) चरण
= 994 महायुग + 6 महायुग
Thursday, March 1, 2012
The Two Dimensions Of Being A Detached Observer (FB)
The Two Dimensions Of Being A Detached Observer
There are two dimensions of being a detached observer - the inner dimension and the outer one.
Let us look at the inner dimension of detached observation. It is the ability or the technique to stand back from or observe in a detached way our own thoughts, feelings, emotions, attitudes and behavior. We are creators and our thoughts, feelings, emotions and attitudes are our creation. In fact, this is the first step to becoming a ruler of the self and making the self powerful. If we fail to detach from our thoughts and emotions then they will be our masters, they will go out of control and will, as a result, leak away or waste our energy. Practice simply being the witness of whatever you are thinking and feeling. This is an important aspect ...of any good spiritual practice and after a while you will find it an experience that both, frees you and empowers you.
The external dimension of detached observation is the technique of being a witness to or an observer of the scenes, of the world around us. As we stand back and watch the scenes of life being played, on the world stage around us, without being actively involved, we can see the 'big picture' more clearly. This makes it easier to judge clearly what is the most suitable contribution that we can make and the most suitable role we can play - through our thoughts, words and actions.
There are two dimensions of being a detached observer - the inner dimension and the outer one.
Let us look at the inner dimension of detached observation. It is the ability or the technique to stand back from or observe in a detached way our own thoughts, feelings, emotions, attitudes and behavior. We are creators and our thoughts, feelings, emotions and attitudes are our creation. In fact, this is the first step to becoming a ruler of the self and making the self powerful. If we fail to detach from our thoughts and emotions then they will be our masters, they will go out of control and will, as a result, leak away or waste our energy. Practice simply being the witness of whatever you are thinking and feeling. This is an important aspect ...of any good spiritual practice and after a while you will find it an experience that both, frees you and empowers you.
The external dimension of detached observation is the technique of being a witness to or an observer of the scenes, of the world around us. As we stand back and watch the scenes of life being played, on the world stage around us, without being actively involved, we can see the 'big picture' more clearly. This makes it easier to judge clearly what is the most suitable contribution that we can make and the most suitable role we can play - through our thoughts, words and actions.
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