बिना सद् गुरु के परमात्मा प्राप्ति असंभव है! उनके बिन साकार रूप मे जैसे आप कि धारण हो वैसे दर्शन तो हो सकते हैं लेकिन प्राप्ति नही| साकार रूप तो दर्शन दे कर वापस निराकार तत्त्व में विलीन हो जाएगा| वास्तव में भगवान किसी विशेष तरह के और जगह पे नहीं हैं! मैं आप को कैसे समझाउं| शब्दों में और बुद्धि के द्वारा संभव नहीं| बस ये समझ लीजिये की जो है सो है| अद्भुद बात तो ये है की मनुष्य में वो क्षमता है की इस ऊँची से ऊँची और गूढ़ से गूढ़ बात का अनुभव पा सकता है वो भी अपने ही अन्दर| आप का जीवन गुण उसी की उपस्थिति का परिणाम है !! वो आप के इतना पास है! जितना पास आप अपने 'मैं' का अनुभव करते हैं! अरे वो अनुभव उसी की उपस्थिति से ही तो है| जिस दिन जिस क्षण आप अपने होने का अनुभव न हो उसी दिन उसी क्षण परमात्मा आप से दूर है ( ऐसा कभी हो सकता है क्या :) .. मृत्यु के बाद भी आप को रंच मात्र संशय नहीं होता की मैं हूँ की नहीं..)| ऐसे की प्राप्ति अपनी ही बेवकूफी से कठिन हो जाती है| वो बेवकूफी क्या है और कैसे दूर होगी.. आत्मसाक्षात्कारी गुरु ही समझ सकता है| जैसे न्यायालय में वकील, शल्य क्रिया में डॉक्टर के बिना कुछ नहीं.. वैसे ही ये गुरु का है ... वहा तो फिर भी काम चल जाए उनके बिना ....
ठीक आप के प्रश्न का एकदम सटीक उत्तर हमारे पुराण एक घटना के द्वारा देते हैं| आदि काल एक राजा (नाम नहीं याद आ रहा) के १० पुत्र हुए जिन्हें प्रचेता बोला जाता था| राजा ने चिर कल के शाशन के बाद पाया की इस जगत में कुछ सार है नहीं| सालों तक भव्यतम राजसी सुख भोगने के बाद भी मांग वही की वही| तब राजा ने प्रचेताओं को बुला के कहा की राज काज में भी वास्तविक सुख नहीं| मैं राज्य के १० भाग कर के तुम को दे के कल वानप्रस्थ गमन करूँगा और गुरु की खोज करूँगा| प्रचेताओं ने विचार किया की " पिता जी इतने बुद्धि मान और प्रतापी हैं| कभी निरर्थक नहीं बोलते| और वो इस जैसे राज्य को छोड़ कर वन जाने की बात करते हैं! जो उन्हें निरर्थक लग रही है अब वो हमें क्या सार्थक लगेगी कभी! इससे पहले की कल इस चक्कर में पड़े, हम आज ही निकल लेते हैं रात को वास्तविक अर्थ की खोज में|" ऐसा कर के वो रात में ही निकल पड़े| लेकिन करे क्या अब ? तो विचार कर भगवान शिव की सच्ची तपस्या की| श्री शिव जी आये तो मार्गदर्शन माँगा की जीवन की वास्तविकता क्या है और कैसे मिलेगी? शिव जी ने भगवन नारायण का मंत्र दिया और बोला की वही इसका उत्तर देंगे| नारायण तपस्या| श्री विष्णु जी आये| उन्होंने कुछ भी मांगने को कहा| प्रचेताओं ने विचार कर कहा की "हम खुद मांगेंगे तो अपनी बुद्धि से मांगेंगे| बच्चा अपनी उतनी भलाई नहीं समझा सकता जितनी माँ| अतः आप वही दे जिसमें हमारा वास्तविक भला है|" विष्णु जी इस
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