Wednesday, April 4, 2012

भस्म

भगवान शिव पर भस्म चढ़ाना एवं भस्म का त्रिपुंड बनाना कोटि महायज्ञ करने के सामान होता है.
साथ साथ उस भस्म कों साधक अपने मस्तक एवं अनेक अंगों पर लगते हैं तो उसके अलग अलग फल प्राप्त होते हैं.

भस्म दो प्रकार के होते हैं:

... १. महा भस्म
२. स्वल्प भस्म

महा भस्म शिवजी का मुख्य स्वरुप है. पर स्वल्प भस्म की अनेक शाखाएं हैं स्त्रोत, स्मार्त और लौकिक भस्म अत्यंत प्रसिद्द स्वल्प भस्म की शाखाएं हैं.

जो भस्म वेद की रीति से धारण की जाती हैं उसे स्त्रोत भस्म कहा जाता है,
जो भस्म स्मृति अथवा पुरानो की रीति से धारण की जाती है उसे स्मार्त कहते हैं.
जो भस्म सांसारिक अग्नि से उत्पन्न होती है और धारण की जाती है उसे लौकिक कहा जाता है.

स्त्रोत तथा स्मार्त भस्म सिर्फ आत्म ज्ञानी ब्रह्मण एवं सन्यासियों कों ही धारण करना चाहिए लेकिन लौकिक भस्म सभी वर्ण के लोग धारण कर सकते हैं. लौकिक भस्म तांत्रिक मन्त्र या भगवान शिव का नाम लेके अपने शारीर पर धारण करना चाहिए. शिव पुराण में लिखा है की भगवान विष्णु, ब्रह्मा के साथ साथ सभी योगी, सिद्ध नाग आदि सभी भस्म धारण करते हैं एवं वेद का कथन है की बिना भस्म धारण किये सब प्रकार के आचार तथा पूजा निष्फल होते हैं. क्योंकि ऐसे मनुष्यों पर ना तो शिव जिसमें ही कृपा करते हैं और न ही उनका कोई कार्य ही सिद्ध होता है.

भस्म का महात्म अनादी तथा अनंत है. भस्म कों धारण करने में कुल और वर्ण का विचार नहीं होता है. भस्म धारण करने वाले मनुष्य कों तीर्थ के सामान समझना चाहिए. भस्म धारण करने वालों कों सम्पूर्ण विद्याओं का निधान समझना चाहिए.

जो मनुष्य भस्म धारण करने वालों की निंदा करता है वह अपने जन्म कों निष्फल कर देता है. पुरुष, स्त्री, बालक, वृद्ध और तरुण सभी भस्म धारण कर सकते हैं. भस्म धारण करने वाले कों अधिक पवित्रता की आवश्यकता नहीं है.
जिस ललाट पर भस्म न हो उसे धिक्कार है, जिस गाँव में शिव मंदिर न हो उसे भी धिक्कार है. सम्पूर्ण देवता मुनि येही कहते हैं की जो लोग भस्म की निंदा करते है वोह बहुत वर्षों तक नरक में निवास करते हैं. :

शरीर के अंगों पर भस्म कहाँ लगाएं:
सर, ललाट, कर्ण, नेत्र , नासिका, मुख, कंठ , भुजा, उदर, हाथ, छाती, पंजर, नाभि, मुस्क, त्रिबेली , दोनों जन्घो के मध्य का भाग, तथा चरण यह सब बत्तीस स्थान हैं लेकिन आम भक्तों के लिए सिर्फ मस्तक में नित्य त्रिपुंड लगाना ही गंगा स्नान करने के फल सामान है.

जो भी भक्त सावन के महीने में भी कम से कम नित्य भगवान शिवजी कों भस्म अर्पण कर के स्वयं अपने माथे में त्रिपुंड (भस्म) लगाये तो उसके पास हमेशा धन धन्य, स्वास्थ तथा ख़ुशी बानी रहती है.

Friday, March 16, 2012

अरब की प्राचीन समृद्ध वैदिक संस्कृति और भारत

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अरब की प्राचीन समृद्ध वैदिक संस्कृति और भारत
अरब देश का भारत, भृगु के पुत्र शुक्राचार्य तथा उनके पोत्र और्व से
ऐतिहासिक संबंध प्रमाणित है, यहाँ तक कि "हिस्ट्री ऑफ पर्शिया" के लेखक
साइक्स का मत है कि अरब का नाम और्व के ही नाम पर पड़ा, जो विकृत होकर
"अरब" हो गया। भारत के उत्तर-पश्चिम में इलावर्त था, जहाँ दैत्य और दानव
बसते थे, इस इलावर्त में एशियाई रूस का दक्षिणी-पश्चिमी भाग, ईरान का
पूर्वी भाग तथा गिलगित का निकटवर्ती क्षेत्र सम्मिलित था। आदित्यों का
आवास स्थान-देवलोक भारत के उत्तर-पूर्व में स्थित हिमालयी क्षेत्रों में
रहा था। बेबीलोन की प्राचीन गुफाओं में पुरातात्त्विक खोज में जो भित्ति
चित्र मिले है, उनमें विष्णु को हिरण्यकशिपु के भाई हिरण्याक्ष से युद्ध
करते हुए उत्कीर्ण किया गया है।
उस युग में अरब एक बड़ा व्यापारिक केन्द्र रहा था, इसी कारण देवों, दानवों
और दैत्यों में इलावर्त के विभाजन को लेकर 12 बार युद्ध 'देवासुर
संग्राम' हुए। देवताओं के राजा इन्द्र ने अपनी पुत्री ज्यन्ती का विवाह
शुक्र के साथ इसी विचार से किया था कि शुक्र उनके (देवों के) पक्षधर बन
जायें, किन्तु शुक्र दैत्यों के ही गुरू बने रहे। यहाँ तक कि जब दैत्यराज
बलि ने शुक्राचार्य का कहना न माना, तो वे उसे त्याग कर अपने पौत्र और्व
के पास अरब में आ गये और वहाँ 10 वर्ष रहे। साइक्स ने अपने इतिहास ग्रन्थ
"हिस्ट्री ऑफ पर्शिया" में लिखा है कि 'शुक्राचार्य लिव्ड टेन इयर्स इन
अरब'। अरब में शुक्राचार्य का इतना मान-सम्मान हुआ कि आज जिसे 'काबा'
कहते है, वह वस्तुतः 'काव्य शुक्र' (शुक्राचार्य) के सम्मान में निर्मित
उनके आराध्य भगवान शिव का ही मन्दिर है। कालांतर में 'काव्य' नाम विकृत
होकर 'काबा' प्रचलित हुआ। अरबी भाषा में 'शुक्र' का अर्थ 'बड़ा' अर्थात
'जुम्मा' इसी कारण किया गया और इसी से 'जुम्मा' (शुक्रवार) को मुसलमान
पवित्र दिन मानते है।
"बृहस्पति देवानां पुरोहित आसीत्, उशना काव्योऽसुराणाम्"-जैमिनिय ब्रा.
(01-125)
अर्थात बृहस्पति देवों के पुरोहित थे और उशना काव्य (शुक्राचार्य) असुरों
के।
प्राचीन अरबी काव्य संग्रह गंथ 'सेअरूल-ओकुल' के 257वें पृष्ठ पर हजरत
मोहम्मद से 2300 वर्ष पूर्व एवं ईसा मसीह से 1800 वर्ष पूर्व पैदा हुए
लबी-बिन-ए-अरव्तब-बिन-ए-तुरफा ने अपनी सुप्रसिद्ध कविता में भारत भूमि
एवं वेदों को जो सम्मान दिया है, वह इस प्रकार है-
"अया मुबारेकल अरज मुशैये नोंहा मिनार हिंदे।
व अरादकल्लाह मज्जोनज्जे जिकरतुन।1।
वह लवज्जलीयतुन ऐनाने सहबी अरवे अतुन जिकरा।
वहाजेही योनज्जेलुर्ररसूल मिनल हिंदतुन।2।
यकूलूनल्लाहः या अहलल अरज आलमीन फुल्लहुम।
फत्तेबेऊ जिकरतुल वेद हुक्कुन मालन योनज्वेलतुन।3।
वहोबा आलमुस्साम वल यजुरमिनल्लाहे तनजीलन।
फऐ नोमा या अरवीयो मुत्तवअन योवसीरीयोनजातुन।4।
जइसनैन हुमारिक अतर नासेहीन का-अ-खुबातुन।
व असनात अलाऊढ़न व होवा मश-ए-रतुन।5।"
अर्थात-(1) हे भारत की पुण्यभूमि (मिनार हिंदे) तू धन्य है, क्योंकि
ईश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझको चुना। (2) वह ईश्वर का ज्ञान प्रकाश,
जो चार प्रकाश स्तम्भों के सदृश्य सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, यह
भारतवर्ष (हिंद तुन) में ऋषियों द्वारा चार रूप में प्रकट हुआ। (3) और
परमात्मा समस्त संसार के मनुष्यों को आज्ञा देता है कि वेद, जो मेरे
ज्ञान है, इनके अनुसार आचरण करो।(4) वह ज्ञान के भण्डार साम और यजुर है,
जो ईश्वर ने प्रदान किये। इसलिए, हे मेरे भाइयों! इनको मानो, क्योंकि ये
हमें मोक्ष का मार्ग बताते है।(5) और दो उनमें से रिक्, अतर (ऋग्वेद,
अथर्ववेद) जो हमें भ्रातृत्व की शिक्षा देते है, और जो इनकी शरण में आ
गया, वह कभी अन्धकार को प्राप्त नहीं होता।
इस्लाम मजहब के प्रवर्तक मोहम्मद स्वयं भी वैदिक परिवार में हिन्दू के
रूप में जन्में थे, और जब उन्होंने अपने हिन्दू परिवार की परम्परा और वंश
से संबंध तोड़ने और स्वयं को पैगम्बर घोषित करना निश्चित किया, तब संयुक्त
हिन्दू परिवार छिन्न-भिन्न हो गया और काबा में स्थित महाकाय शिवलिंग
(संगे अस्वद) के रक्षार्थ हुए युद्ध में पैगम्बर मोहम्मद के चाचा उमर-बिन-
ए-हश्शाम को भी अपने प्राण गंवाने पड़े। उमर-बिन-ए-हश्शाम का अरब में एवं
केन्द्र काबा (मक्का) में इतना अधिक सम्मान होता था कि सम्पूर्ण अरबी
समाज, जो कि भगवान शिव के भक्त थे एवं वेदों के उत्सुक गायक तथा हिन्दू
देवी-देवताओं के अनन्य उपासक थे, उन्हें अबुल हाकम अर्थात 'ज्ञान का
पिता' कहते थे। बाद में मोहम्मद के नये सम्प्रदाय ने उन्हें ईष्यावश अबुल
जिहाल 'अज्ञान का पिता' कहकर उनकी निन्दा की।
जब मोहम्मद ने मक्का पर आक्रमण किया, उस समय वहाँ बृहस्पति, मंगल,
अश्विनी कुमार, गरूड़, नृसिंह की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित थी। साथ ही एक
मूर्ति वहाँ विश्वविजेता महाराजा बलि की भी थी, और दानी होने की
प्रसिद्धि से उसका एक हाथ सोने का बना था। 'Holul' के नाम से अभिहित यह
मूर्ति वहाँ इब्राहम और इस्माइल की मूर्त्तियो के बराबर रखी थी। मोहम्मद
ने उन सब मूर्त्तियों को तोड़कर वहाँ बने कुएँ में फेंक दिया, किन्तु तोड़े
गये शिवलिंग का एक टुकडा आज भी काबा में सम्मानपूर्वक न केवल प्रतिष्ठित
है, वरन् हज करने जाने वाले मुसलमान उस काले (अश्वेत) प्रस्तर खण्ड
अर्थात 'संगे अस्वद' को आदर मान देते हुए चूमते है।
प्राचीन अरबों ने सिन्ध को सिन्ध ही कहा तथा भारतवर्ष के अन्य प्रदेशों
को हिन्द निश्चित किया। सिन्ध से हिन्द होने की बात बहुत ही अवैज्ञानिक
है। इस्लाम मत के प्रवर्तक मोहम्मद के पैदा होने से 2300 वर्ष पूर्व यानि
लगभग 1800 ईश्वी पूर्व भी अरब में हिंद एवं हिंदू शब्द का व्यवहार ज्यों
का त्यों आज ही के अर्थ में प्रयुक्त होता था।
अरब की प्राचीन समृद्ध संस्कृति वैदिक थी तथा उस समय ज्ञान-विज्ञान, कला-
कौशल, धर्म-संस्कृति आदि में भारत (हिंद) के साथ उसके प्रगाढ़ संबंध थे।
हिंद नाम अरबों को इतना प्यारा लगा कि उन्होंने उस देश के नाम पर अपनी
स्त्रियों एवं बच्चों के नाम भी हिंद पर रखे।
अरबी काव्य संग्रह ग्रंथ ' सेअरूल-ओकुल' के 253वें पृष्ठ पर हजरत मोहम्मद
के चाचा उमर-बिन-ए-हश्शाम की कविता है जिसमें उन्होंने हिन्दे यौमन एवं
गबुल हिन्दू का प्रयोग बड़े आदर से किया है । 'उमर-बिन-ए-हश्शाम' की कविता
नयी दिल्ली स्थित मन्दिर मार्ग पर श्री लक्ष्मीनारायण मन्दिर (बिड़ला
मन्दिर) की वाटिका में यज्ञशाला के लाल पत्थर के स्तम्भ (खम्बे) पर काली
स्याही से लिखी हुई है, जो इस प्रकार है -
" कफविनक जिकरा मिन उलुमिन तब असेक ।
कलुवन अमातातुल हवा व तजक्करू ।1।
न तज खेरोहा उड़न एललवदए लिलवरा ।
वलुकएने जातल्लाहे औम असेरू ।2।
व अहालोलहा अजहू अरानीमन महादेव ओ ।
मनोजेल इलमुद्दीन मीनहुम व सयत्तरू ।3।
व सहबी वे याम फीम कामिल हिन्दे यौमन ।
व यकुलून न लातहजन फइन्नक तवज्जरू ।4।
मअस्सयरे अरव्लाकन हसनन कुल्लहूम ।
नजुमुन अजा अत सुम्मा गबुल हिन्दू ।5।
अर्थात् - (1) वह मनुष्य, जिसने सारा जीवन पाप व अधर्म में बिताया हो,
काम, क्रोध में अपने यौवन को नष्ट किया हो। (2) अदि अन्त में उसको
पश्चाताप हो और भलाई की ओर लौटना चाहे, तो क्या उसका कल्याण हो सकता है ?
(3) एक बार भी सच्चे हृदय से वह महादेव जी की पूजा करे, तो धर्म-मार्ग
में उच्च से उच्च पद को पा सकता है। (4) हे प्रभु ! मेरा समस्त जीवन लेकर
केवल एक दिन भारत (हिंद) के निवास का दे दो, क्योंकि वहाँ पहुँचकर मनुष्य
जीवन-मुक्त हो जाता है। (5) वहाँ की यात्रा से सारे शुभ कर्मो की
प्राप्ति होती है, और आदर्श गुरूजनों (गबुल हिन्दू) का सत्संग मिलता है ।
- विश्वजीत सिंह 'अनंत'

Thursday, March 15, 2012

वायु से बढ़ाएँ आयु

कछुए की साँस लेने और छोड़ने की गति इनसानों से कहीं अधिक दीर्घ है। व्हेल मछली की उम्र का राज भी यही है। बड़ और पीपल के वृक्ष की आयु का राज भी यही है। वायु को योग में प्राण कहते हैं। प्राचीन ऋषि वायु के इस रहस्य को समझते थे तभी तो वे कुंभक लगाकर हिमालय की गुफा में वर्षों तक बैठे रहते थे। श्वास को लेने और छोड़ने के दरमियान घंटों का समय प्राणायाम के अभ्यास से ही संभव हो पाता है।
...
शरीर में दूषित वायु के होने की स्थिति में भी उम्र क्षीण होती है और रोगों की उत्पत्ति होती है। पेट में पड़ा भोजन दूषित हो जाता है, जल भी दूषित हो जाता है तो फिर वायु क्यों नहीं। यदि आप लगातार दूषित वायु ही ग्रहण कर रहे हैं तो समझो कि समय से पहले ही रोग और मौत के निकट जा रहे हैं।

असंयमित श्वास के कारण - बाल्यावस्था से ही व्यक्ति असावधानीपूर्ण और अराजक श्वास लेने और छोड़ने की आदत के कारण ही अनेक मनोभावों से ग्रसित हो जाता है। जब श्वास चंचल और अराजक होगी तो चित्त के भी अराजक होने से आयु का भी क्षय शीघ्रता से होता रहता है।

फिर व्यक्ति जैसे-जैसे बड़ा होता है काम, क्रोध, मद, लोभ, व्यसन, चिंता, व्यग्रता, नकारात्मता और भावुकता के रोग से ग्रस्त होता जाता है। उक्त रोग व्यक्ति की श्वास को पूरी तरह तोड़कर शरीर स्थित वायु को दूषित करते जाते हैं जिसके कारण शरीर का शीघ्रता से क्षय होने लगता है।

कुंभक का अभ्यास करें - हठयोगियों ने विचार किया कि यदि सावधानी से धीरे-धीरे श्वास लेने व छोड़ने और बाद में रोकने का भी अभ्यास बनाया जाए तो परिणामस्वरूप चित्त में स्थिरता आएगी।

श्वसन-क्रिया जितनी मंद और सूक्ष्म होगी उतना ही मंद जीवन क्रिया के क्षय होने का क्रम होगा। यही कारण है कि श्वास-प्रश्वास का नियंत्रण करने तथा पर्याप्त समय तक उसको रोक रखने (कुंभक) से आयु के भी बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है। इसी कारण योग में कुंभक या प्राणायाम का सर्वाधिक महत्व माना गया है।

सावधानी- आंतरिक कुंभक अर्थात श्वास को अंदर खींचकर पेट या अन्य स्थान में रोककर रखने से पूर्व शरीरस्थ ना‍ड़ियों में स्थित दूषित वायु को निकालने के लिए बाहरी कुंभक का अभ्यास करना आवश्यक है। अतः सभी नाड़ियों सहित शरीर की शुद्धि के बाद ही कुंभक का अभ्यास करना चाहिए।

वैसे तो प्राणायाम अनुलोम-विलोम के भी नाड़ियों की शुद्धि होकर शरीर शुद्ध होता है और साथ-साथ अनेक प्रकार के रोग भी दूर होते हैं, किन्तु किसी प्रकार की गलती इस अभ्यास में हुई तो अनेक प्रकार के रोगों के उत्पन्न होने की संभावना भी रहती है। अतः उचित रीति से ही प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए।

प्राणायाम का रहस्य - इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना ये तीन नाड़ियाँ प्रमुख हैं। प्राणायम के लगातार अभ्यास से ये नाड़ियाँ ‍शुद्ध होकर जब सक्रिय होती हैं तो व्यक्ति के शरीर में किसी भी प्रकार का रोग नहीं होता और आयु प्रबल हो जाती है। मन में किसी भी प्रकार की चंचलता नहीं रहने से स्थिर मन शक्तिशाली होकर धारणा सिद्ध हो जाती है अर्थात ऐसे व्यक्ति की सोच फलित हो जाती है। यदि लगातार इसका अभ्यास बढ़ता रहा तो व्यक्ति सिद्ध हो जाता है।

Wednesday, March 14, 2012

भारतीय बहुधर्मीय समरसता

बहुधर्मीय समरसता का मंत्र

भारत में धार्मिक बहुवाद की परंपरा बडी प्राचीन है। प्राचीनकाल से ही अनेक धर्म और उनके अनुयायी इस भूमि पर फल-फूल रहे हैं और समय के साथ उनमें जो सामंजस्य और सहिष्णुता निर्मित हुई है उसीके कारण उनकी विविधताओं में एकता के जो दर्शन होते हैं वैसे दर्शन कहीं और होना अत्यंत दुर्लभ है। इस भारतीय धर्म-धारणा और उनके दर्शन की विविधाताओं में जिस एकता के दर्शन होते हैं उसका अनुपमेय उदाहरण है शिव-परिवार। इस परिवार के प्रत्येक सदस्य के वाहन, विन्यास, प्रतीक और क्रिया-कलापों में एकतरफ तो विषमता है तो दूसरी तरफ अद्‌भूत एकात्मता का सुंदर परिचय प्राप्त होता है।

शिव के बारह ज्योतिर्लिगों में भारत की अखंडता के दर्शन होते हैं। जो उन्हें आदि-देव का रुप प्रदान करते हैं और पत्नी पार्वती को जगतमाताका। उनके बडे पुत्र कार्तिकेय के पास हिंदुओं द्वारा पूजे जानेवाले सभी देवताओं का सेनापतित्व है तो, दूसरे पुत्र गणेश उन सभी देवताओं में सर्वप्रथम पूज्य हैं। लेकिन स्वयं शिव स्मशान विहारी हैं। कार्तिकेय या कार्तिकस्वामी को दक्षिण भारत में सुब्रहमण्यम, मुरुगन, षणमुखम आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है। उत्तर भारत में इन्हें ब्रह्मचारी तो, दक्षिण भारत में इनकी दो पत्नियां होना माना जाता है। पहली इंद्रपुत्री देवयानी (जिसके कारण कार्तिकेय को दैवयानैमणालन कहा जाता है) कार्तिकेय से देवयानी का विवाह हो इसकी इच्छा स्वयं इंद्र ने महाविष्णु, ब्रह्मा आदि के समक्ष प्रकट की थी। जिसका सभी देवताओं ने स्वागत किया था। तो, दूसरी पत्नी वल्ली (जिसके पति होने के कारण उन्हें वल्लीमणालन भी कहा जाता है) यह पूर्व जन्म में भगवान विष्णु की पुत्री थी। इन विवाहों के वर्णन का कथानक दुर्गादास स्वामी के संक्षिप्त तमिल स्कंद पुराण में मिलता है। ठीक इसी तरह जहां गणेशजी को उत्तर भारत में विवाहित तो दक्षिण भारत में ब्रह्मचारी माना जाता है। इसी प्रकार से इनके आसपास के वातावरण को देखें तो हमें दिखाई देगा कि शिवजी गले में सर्प है जिसका शत्रु मोर है जो कार्तिकेयजी का वाहन है और गणेशजी का वाहन चूहा है जिसका शत्रु सांप है चूहा सांप का भोजन भी है। फिर भी ये सब एक साथ एक ही जगह सुख-शांति से सहअस्तित्व को स्वीकारते हुए रह रहे हैं।

शिव के भक्त शैव तो उनके विपरीत गुणधर्म वाले विष्णु के भक्त वैष्णव कहलाते हैं। इन दो प्रमुख संप्रदायों की एकता का प्रतीक है उज्जैन की हरिहर यात्रा तो दक्षिण भारत में हर और हरि के संयुक्त प्रतीक के रुप में स्वामी अयप्पा की पूजा का प्रचलन। इसी तरह से तीन प्रमुख देवताओं ब्रह्मा, विष्णु, महेश जिनमें ब्रह्माजी निर्माणकर्ता, भगवान विष्णु पालनहार तो शिवजी संहार के देवता होने के बावजूद इनके संयुक्त प्रतीक के रुप में भगवान दत्तात्रय की पूजा की जाती है। जो हमारी व्यापक सोच-सामंजस्य, सहिष्णुता के साथ ही एकता में अनेकता को स्वीकारने की प्रवृत्ति को दर्शाती है। शिवजी भोलेभंडारी तो भगवान विष्णु चतुर मायावी जिन्होंने शिवजी द्वारा भोलेपन में भस्मासुर को दिए वरदान से जिसके कारण उनके प्राण संकट में आ गए थे की रक्षा के लिए मोहिनी रुप धारण कर भस्मासुर से उनकी रक्षा की। न केवल इनके कार्य परस्पर विरोधी हैं अपितु शिवजी जो गले में सर्प को धारण किए रहते हैं का शत्रु गरुड है जो विष्णुजी का वाहन है और ब्रह्माजी का आसन कमल पुष्प है जो अति कोमल होता है। इन्हीं ब्रह्माजी के पुत्र हैं नारदमुनि जो भगवान विष्णु के भक्त होकर तीनो लोकों में विहार करते हैं और इन तीनों के संपर्क सूत्र का कार्य भी निभाहते हैं। इन तीनों का सामंजस्य देखिए कि जब ब्रह्माजी रावण की भक्ति से प्रसन्न हो उसे अमरत्व का वरदान दे बैठे तो उसके नाश के लिए विष्णुजी ने भगवान राम का अवतार लिया तो उनके सेवक के रुप में भगवान शिव के अंश हनुमानजी ने जन्म लिया।
विपरीतताओं के बावजूद मॉं शारदा तीनो ही देवताओं की आराध्य हैं। इन्हीं मॉं शारदा ने देवी सरस्वती के रुप में रावण के भाई कुंभकर्ण, जो रावण के साथ ही ब्रह्माजी की भक्ति कर रहा था, द्वारा ब्रह्माजी से वरदान मांगते समय कोई ऐसा वरदान न मांग लिया जाए जो रावण को अमरत्व प्राप्त होने के बाद रक्ष संस्कृति के लिए सहायक सिद्ध हो के निवारणार्थ कुंभकर्ण की जिह्वा पर जा बैठी और कुंभकर्ण छः महीने सोते रहने और केवल छः महीने जागने का वरदान मांग बैठा।

देवी सरस्वती जो ऋगवेद, सामवेद और यजुर्वेद की माता होने के साथ ब्रह्मा की उत्पादक शक्ति है का वर्चस्व जैन धर्म की सोलह विद्या की देवताओं पर है। वाक्‌देवी के रुप में हिंदू, जैन और बौद्धों को समान रुप से पूज्य है। बौद्ध इसे मंजूश्री की आत्मा के रुप में मानते हैं। तो, हंस या मयूर वाहन पर सरस्वती जैन परम्परा में ऋतुदेवी के नाम से विख्यात हैं। पुराणों में इसका संदर्भ ब्रह्मा और विष्णु से बताया गया है। मार्कंडेय पुराण में तो इसे जगद्वात्री के रुप में संबोधित किया गया है।

हमारी मान्यताएं जो सहिष्णुता और सामंजस्य से परिपूर्ण हैं यहीं तक आकर नहीं रुकती वरन्‌ आगे जाकर निरीश्वरवाद तक को अपनी मान्यता के दायरे में ले आती हैं। चार्वाक ने अपने निरीश्वरवाद का उद्‌घोष महांकाल की सीढ़ियों पर बैठकर ही किया था। उनका सिद्धांत था यावज्जीवेत सुखं जीवेत ऋणं कृत्वा घृतं पीबेत। भस्मी भूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः।। यह अपने मतों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सहिष्णुतापूर्वक मान्य करने की चरम सीमा है। चार्वाक कोई एक ही व्यक्ति नहीं, जो नास्तिकता के दर्शन को मानता है वह चार्वाक। चार्वाक दर्शन की शुरुआत वेदकाल से मानी जाती है। तो, देवताओं के गुरु बृहस्पति पहले चार्वाकवादी माने जाते हैं। कर्मकांड और बंधनों से समाज को मुक्तता का मार्ग दिखलानेवाले आध्यात्मिक स्वतंत्रता का समर्थन करनेवाले कुछ चार्वाक भी थे। परंतु, केवल अनियंत्रित स्वतंत्र जीवन का समर्थन न करते समझदार व्यक्ति ने खेती-बाडी, गो-पालन, व्यापार-व्यवसाय और दंड-नीति आदि जैसे सरल मार्ग का अवलंबन कर जीवन की भौतिक सुख-सुविधाओं का उपभोग करते हुए जीवनयापन करना चाहिए। इस प्रकार का कुछ कथन इन चार्वाकवादियों का है।

उपर्युक्त मीमांसा हमारी सहिष्णुता और आपसी सामंजस्य से उपजी व्यापक सोच को दर्शाने के लिए है और इसके पीछे है हमारी धर्म संबंधी व्यापक संकल्पना। हमारे यहां धर्म कोई बाह्याचार नहीं बल्कि धर्म वह है जिसके पालन से समाज सुव्यवस्थित रहता है। इसके लिए कुछ नियम बनाकर उनका पालन करना होता है। इससे कर्तव्य का बोध होता है। उदा. माता-पिता की सेवा करना हमारा धर्म है, सेवा ही धर्म है, निर्बल की रक्षा करना धर्म है, पशुओं पर दया करना धर्म है, यजुर्वेद में भी कहा गया है 'प्राणी मात्र को मित्र की दृष्टि से देखो" आदि। चूंकि मनुष्य को ही परमेश्वर ने बुद्धि दी है अतः मनुष्य ही अपने मूल प्राकृतिक गुणधर्मों को मोडकर नियंत्रित कर सकता है। उन पर विजय प्राप्त कर सकता है। जो पशुओं के लिए संभव नहीं। इसीलिए तो कहा गया है मनुष्य और पशु में अंतर करनेवाला विभेदक धर्म ही है। इसके लिए मनुष्य कुछ नियम बनाता है जो उसकी प्राकृतिक प्रवृत्तियों को नियंत्रित करते हैं, पशुओं से मनुष्य के अलगत्व को दर्शाते हैं। इन्हीं नियमों की मदद से मनुष्य समाज का निर्माण करता है और सामाजिक प्राणी कहलाता है। इस आधार पर ऐसी नियमावली को जो समाज या देश को सुचारु रुप से चलाने में सहायक सिद्ध हो को भी धर्म कहा जा सकता है। इस दृष्टि से हम हमारे संविधान को भी इहलोक से संबंधित विभिन्न विषयों पर के नियमों के संकलन के आधार पर आधुनिक धर्म-ग्रंथ कह सकते हैं। लेकिन इस पृथ्वी पर शायद ही कोई ऐसा धर्म हो जिसमें ईश्वर की संकल्पना न हो। इस दृष्टि से तो निरीश्वरवादियों को तो यह सहर्ष मान्य होगा। परंतु, आस्तिकों के लिए उनके ऐहिक जीवन व्यवस्था के नियंत्रक के रुप में ही केवल मान्य होगा। क्योंकि, आस्तिकों की दृष्टि में धर्म यानी इहलोक और परलोक दोनो के कल्याण की व्यवस्था। परलोक के संबंध में या मरणोत्तर अवस्था के संबंध में हर धर्म की श्रद्धा अलग-अलग है। जहां हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार जीवन का लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति है और इसके लिए जीवात्मा अपने कर्मफलानुसार तब तक जीवन ग्रहण करता रहता है जब तक कि उसके पुण्यकर्म इतने प्रबल नहीं हो जाते कि उसको मोक्ष की प्राप्ति हो जाए। वहीं ईसाइयत और इस्लाम की मरणोत्तर जीवन की संकल्पना में जजमेंट डे, न्याय दिवस, आखिरत है।

संस्कृत में एक श्लोक है - श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वाचैवार्व धार्रयतम्‌। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्‌।। अर्थात्‌ संपूर्ण धर्म का सार सुनो और सुनकर उसको भली-भांति धारण करो। वह यह कि जिस व्यवहार को तुम स्वयं अपने साथ उचित नहीं समझते, वैसा व्यवहार कभी दूसरों के साथ भी न करो।

इस धारणा और उपर्युक्त विवेचना के आधार पर सहज ही प्रतिपादित किया जा सकता है कि संविधान का पालन सभी के इहलौकिक जीवन यानी अभ्युदय के लिए समान रुप से मान्य होना चाहिए। भले ही पारलौकिक जीवन की निःश्रेयस की श्रद्धाएं भिन्न क्यों न हों और उसके लिए सर्वधर्म समादर की भावना का अंगीकार करना आवश्यक है और यह कहने मात्र से काम नहीं होगा इसके लिए हमें यह स्वीकारना होगा कि भारत एक बहुधर्मीय देश है और भविष्य में भी रहेगा। हमे हमारे धर्मों का पालन करते हुए इसी देश में, इसी देश के संविधान के अंतर्गत रहना है। धर्म की सबकी सब आज्ञाओं का पालन आज के समय में संभव नहीं इस मर्यादा को स्वीकारना होगा। यह सहज संभव हो सके इसके लिए एक दूसरे के धर्मों का अध्ययन कर एक दूसरे के मानस को समझना होगा। हां, यह सत्य है कि दूसरे धर्म का अध्ययन हर किसी के लिए सहज संभव नहीं। क्योंकि, हर एक की अपनी सीमाएं हैं। इसके लिए हर समाज के कुछ प्रबुद्ध बुद्धिजीवियों को ही आगे आकर एक दूसरे धर्मो का अध्ययन कर उसकी वास्तविकता को समाज के सामने रखना होगा।

Tuesday, March 13, 2012

सप्तर्षि - मन्वन्तर

मण्डल आकाश में सुप्रसिद्ध ज्योतिर्मण्डलों में है। इसके अधिष्ठाता ऋषिगण लोक में ज्ञान-परम्परा को सुरक्षित रखते हैं। अधिकारी जिज्ञासु को प्रत्यक्ष या परोक्ष, जैसा वह अधिकारी हो, तत्त्वज्ञान की ओर उन्मुख करके मुक्ति-पथ में लगाते हैं।
प्रत्येक मन्वन्तर में इनमें से कुछ ऋषि परिवर्तित होते रहते हैं।
विष्णु पुराण के अनुसार इनकी नामावली इस प्रकार है-
...
प्रथम स्वायम्भुव मन्वन्तर में- मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वशिष्ठ।
द्वितीय स्वारोचिष मन्वन्तर में— ऊर्ज्ज, स्तम्भ, वात, प्राण, पृषभ, निरय और परीवान।
तृतीय उत्तम मन्वन्तर में— महर्षि वशिष्ठ के सातों पुत्र।
चतुर्थ तामस मन्वन्तर में— ज्योतिर्धामा, पृथु, काव्य, चैत्र, अग्नि, वनक और पीवर।
पंचम रैवत मन्वन्तर में— हिरण्यरोमा, वेदश्री, ऊर्ध्वबाहु, वेदबाहु, सुधामा, पर्जन्य और महामुनि।
षष्ठ चाक्षुष मन्वन्तर में— सुमेधा, विरजा, हविष्मान, उतम, मधु, अतिनामा और सहिष्णु।
वर्तमान सप्तम वैवस्वत मन्वन्तर में— कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भारद्वाज।
अष्टम सावर्णिक मन्वन्तर में— गालव, दीप्तिमान, परशुराम, अश्वत्थामा, कृप, ऋष्यश्रृंग और व्यास।
नवम दक्षसावर्णि मन्वन्तर में— मेधातिथि, वसु, सत्य, ज्योतिष्मान, द्युतिमान, सबन और भव्य।
दशम ब्रह्मसावर्णि मन्वन्तर में— तपोमूर्ति, हविष्मान, सुकृत, सत्य, नाभाग, अप्रतिमौजा और सत्यकेतु।
एकादश धर्मसावर्णि मन्वन्तर में— वपुष्मान्, घृणि, आरुणि, नि:स्वर, हविष्मान्, अनघ, और अग्नितेजा।
द्वादश रुद्रसावर्णि मन्वन्तर में— तपोद्युति, तपस्वी, सुतपा, तपोमूर्ति, तपोनिधि, तपोरति और तपोधृति।
त्रयोदश देवसावर्णि मन्वन्तर में— धृतिमान्, अव्यय, तत्त्वदर्शी, निरूत्सुक, निर्मोह, सुतपा और निष्प्रकम्प।
चतुर्दश इन्द्रसावर्णि मन्वन्तर में— अग्नीध्र, अग्नि, बाहु, शुचि, युक्त, मागध, शुक्र और अजित।।

इन ऋषियों में से सब कल्पान्त-चिरजीवी, मुक्तात्मा और दिव्यदेहधारी हैं।
'शतपथ ब्राह्मण' के अनुसार

गौतम,
भारद्वाज,
विश्वामित्र,
जमदग्नि,
वसिष्ठ,
कश्यप और
अत्रि तथा

'महाभारत' के अनुसार

मरीचि,
अत्रि,
अंगिरा,
पुलह,
क्रतु,
पुलस्त्य और
वसिष्ठ सप्तर्षि माने गये हैं।

इसके अतिरिक्त सप्तऋषि से उन सात तारों का बोध होता है, जो ध्रुवतारा की परिक्रमा करते हैं।

******* मन्वन्तर क्या होता है *******

सृष्टि की आयु का अनुमान लगाने के लिये चार युगों

सत युग,
त्रेता युग,
द्वापर युग,और
कलि युग का एक 'महायुग' माना जाता है ।

71 महायुग मिलकर एक 'मन्वंतर' बनाता है।
महायुग की अवधि 43 लाख 20 हज़ार वर्ष मानी गई है।
14 मन्वंतरों का एक 'कल्प' होता है।
प्रत्येक मन्वंतर में सृष्टि का एक मनु होता है और उसी के नाम पर उस मन्वंतर का नाम पड़ता है।
मानवीय गणना के अनुसार एक मन्वंतर में तीस करोड़ ,अड़सठ लाख , बीस हज़ार वर्ष होते हैं ।
पुराणों में चौदह मन्वंतर इस प्रकार हैं-

स्वायंभुव ,
स्वारोचिष,
उत्तम ,
तामस,
रैवत,
चाक्षुष,
वैवस्वत,
अर्क सावर्णि,
दक्ष सावर्णि,
ब्रह्म सावर्णि,
धर्म सावर्णि,
रुद्र सावर्णि,
रौच्य,
भौत्य।

इनमें से चाक्षुस तक के मन्वंतर बीत चुके हैं ।
वैवस्वत इस समय चल रहा है । संकल्प आदि में इसी का नामोच्चार होता है ।

Social Maths !

Truth = Honesty
Love = Compassion
Courage = Valor
Truth + Love = Justice
Truth + Courage = Honor
... Love + Courage = Sacrifice
Truth + Love + Courage = Spirituality
The absence of Truth, Love, and Courage is Pride, the opposite of which is Humility.

महादेव का व्यापक चरित्र

शिव...........?????????????????
अनादि, अनंत, देवाधिदेव, महादेव शिव परंब्रह्म हैं| सहस्र नामों से जाने जाने वाले त्र्यम्बकम् शिव साकार, निराकार, ॐकार और लिंगाकार रूप में देवताओं, दानवों तथा मानवों द्वारा पुजित हैं| महादेव रहस्यों के भंडार हैं| बड़े-बड़े ॠषि-महर्षि, ज्ञानी, साधक, भक्त और यहाँ तक कि भगवान भी उनके संम्पूर्ण रहस्य नहीं जान पाए| आशुतोष भगवान अपने व्यक्त रूप में त्रिलोकी के तीन देवताओं म...ें ब्रह्मा एवं विष्णु के साथ रुद्र रूप में विराजमान हैं| ये त्रिदेव, हिन्दु धर्म के आधार और सर्वोच्च शिखर हैं| पर वास्तव में महादेव त्रिदेवों के भी रचयिता हैं| महादेव का चरित्र इतना व्यापक है कि कइ बार उनके व्याख्यान में विरोधाभाष तक हो जाता है| एक ओर शिव संहारक कहे जाते हैं तो दूसरी ओर वे परंब्रह्म हैं जिस लिंगाकार रूप में वे सबसे ज्यादा पूज्य हैं| जहां वे संसार के मूल हैं वहीं वे अकर्ता हैं| जहां उनका चित्रण श्याम वर्ण में होता है वहीं वे कर्पूर की तरह गोरे, कर्पूर गौरं, माने जाते हैं| जिन भगवान रूद्र के क्रोध एवं तीसरे नेत्र के खुलने के भय से संसार अक्रांत होता है और जो अनाचार करने पर अपने कागभुष्डीं जैसे भक्तों तथा ब्रह्मा जैसे त्रिदेवों को भी दण्डित करने से नहीं चुकते, वही आसुतोष भगवान अपने सरलता के कारण भोलेनाथ हैं तथा थोडी भक्ति से ही किसी से भी प्रसन्न हो जाते हैं| एक ओर रूद्र मृत्यु के देवता माने जाते हैं तो महामृत्यंजय भी उनके अलावा कोई दुसरा नहीं
पर उस विरोधाभाष में भी एका स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है| आइए जानने की कोशिश करतें हैं आसुतोष भगवान के उन मनमोहन रूपों को जिसकी व्याख्यान प्राचीन आचार्यों तथा देवगणों ने कलमबद्ध किया है|

Om Namah Shivaya

नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मे "न" काराय नमः शिवायः॥

मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय।
मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मे "म" काराय नमः शिवायः॥

शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय|
श्री नीलकंठाय वृषभद्धजाय तस्मै "शि" काराय नमः शिवायः॥

वषिष्ठ कुभोदव गौतमाय मुनींद्र देवार्चित शेखराय।
चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय तस्मै "व" काराय नमः शिवायः॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय|
दिव्याय देवाय दिगंबराय तस्मै "य" काराय नमः शिवायः॥

पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेत शिव सन्निधौ|
शिवलोकं वाप्नोति शिवेन सह मोदते॥

आर्य और द्रविड़ दोनों गुण वाचक शब्द है ,जाति वाचक नहीं

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आर्य और द्रविड़ दोनों गुण वाचक शब्द है ,जाति वाचक नहीं । परन्तु ब्रिटिश इतिहासकारों ने इनका जातिवाचक प्रयोग कर देश में विखराव पैदा कर दिया।यह वैसा ही शरारती कारनामा था जैसा राम जन्मभूमि आन्दोलन केसमय अर्जुन सिंह ने किया था ।सहमत (सफ़दर हाशमी मेमोरिअल ट्रस्ट )द्वारा अयोध्या में एक पोस्टर में -राम ने जनक (फादर )सुता (डाटर)से विवाह किया का अनुवाद अर्जुन सिंह के चहेतों ने किया राम मेरीड हिज फादर्स डाटर ।अंग्रेजो और काले अंग्रेजो में कैसी समानता है ।
आर्य का अर्थ है सुसभ्य ,सुसंस्कृत ।सभी वैदिक विद्वान् यही अर्थ करते है ।
प्रियं माँ क्रनु देवेसु प्रियं राजसु माँ कृधि
प्रियं सर्वत्र पश्यत इत शूद्रे उत आर्ये द्रविड़ अर्थ होता है धन संपत्ति हम भगवान को द्रविड़ कहते है -त्वमेव विद्या द्रविड़म त्वमेव ।
उत्तर के लोग दक्षिण वालो को द्रविड़इसलिए कहते थे क्यों कि दक्षिण वालो ने कभी लोहे के पानी का स्वाद नहीं चखा ।विदेशी आक्रान्ताओ ने विन्द्याचल के नीचे लूटमार नहीं की। सोने की एक मात्र खान दक्षिण भारत में ,हीरो की खाने दक्षिण में ,मसाले दक्षिण में ,बार बार आक्रमण न होने से राजनीतिक स्थिरता एवं शांति के कारण निर्वाध व्यापार ।इस कारण दक्षिण भारतीय द्रविड़ कहलाते थे ।वे धनाड्य थे जाति नहीं ।क्रमशः ----

Wednesday, March 7, 2012

अपनी भारत की संस्कृति को पहचाने

अपनी भारत की संस्कृति को पहचाने --- दो पक्ष - कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष ! तीन ऋण - देव ऋण, पित्र ऋण एवं ऋषि त्रण ! चार युग - सतयुग , त्रेता युग , द्वापरयुग एवं कलयुग ! चार धाम - द्वारिका , बद्रीनाथ, जगन्नाथ पूरी एवं रामेश्वरम
धाम ! चारपीठ - शारदा पीठ ( द्वारिका ), ज्योतिष पीठ
( जोशीमठ बद्रिधाम), गोवर्धन पीठ ( जगन्नाथपुरी ) एवं
श्रन्गेरिपीठ ! चर वेद- ऋग्वेद , अथर्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद ! चार आश्रम - ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , बानप्रस्थ एवं संन्यास ! चार अंतःकरण - मन , बुद्धि , चित्त , एवं अहंकार ! पञ्च गव्य - गाय का घी , दूध , दही , गोमूत्र एवं गोबर , ! पञ्च देव - गणेश , विष्णु , शिव , देवी और सूर्य ! पंच तत्त्व - प्रथ्वी , जल , अग्नि , वायु एवं आकाश ! छह दर्शन - वैशेषिक , न्याय , सांख्य, योग , पूर्व मिसांसा एवं
दक्षिण मिसांसा ! सप्त ऋषि - विश्वामित्र , जमदाग्नि , भरद्वाज , गौतम ,
... अत्री , वशिष्ठ और कश्यप ! सप्त पूरी - अयोध्या पूरी , मथुरा पूरी , माया पूरी ( हरिद्वार ) ,
कशी , कांची ( शिन कांची - विष्णु कांची ) , अवंतिका और
द्वारिका पूरी ! आठ योग - यम , नियम, आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार ,
धारणा , ध्यान एवं समाधी ! आठ लक्ष्मी - आग्घ , विद्या , सौभाग्य , अमृत , काम , सत्य ,
भोग , एवं योग लक्ष्मी ! नव दुर्गा - शैल पुत्री , ब्रह्मचारिणी , चंद्रघंटा , कुष्मांडा ,
स्कंदमाता , कात्यायिनी , कालरात्रि , महागौरी एवं
सिद्धिदात्री ! दस दिशाएं - पूर्व , पश्चिम , उत्तर , दक्षिण , इशान ,
नेत्रत्य , वायव्य आग्नेय ,आकाश एवं पाताल ! मुख्या ग्यारह अवतार - मत्स्य , कच्छप , बराह , नरसिंह ,
बामन , परशुराम , श्री राम , कृष्ण , बलराम , बुद्ध , एवं कल्कि ! बारह मास - चेत्र , वैशाख , ज्येष्ठ ,अषाड़ , श्रावन , भाद्रपद ,
अश्विन , कार्तिक , मार्गशीर्ष . पौष , माघ , फागुन ! बारह राशी - मेष , ब्रषभ , मिथुन , कर्क , सिंह , तुला ,
ब्रश्चिक , धनु , मकर , कुम्भ , एवं कन्या ! बारह ज्योतिर्लिंग - सोमनाथ , मल्लिकर्जुना , महाकाल ,
ओमकालेश्वर , बैजनाथ , रामेश्वरम , विश्वनाथ ,
त्रियम्वाकेश्वर , केदारनाथ , घुष्नेश्वर , भीमाशंकर एवं
नागेश्वर ! पंद्रह तिथियाँ - प्रतिपदा , द्वतीय , तृतीय , चतुर्थी ,
पंचमी , षष्ठी , सप्तमी , अष्टमी , नवमी , दशमी , एकादशी ,
द्वादशी , त्रयोदशी , चतुर्दशी , पूर्णिमा , अमावश्या ! स्म्रतियां - मनु , विष्णु, अत्री , हारीत , याज्ञवल्क्य ,
उशना , अंगीरा , यम , आपस्तम्ब , सर्वत , कात्यायन ,
ब्रहस्पति , पराशर , व्यास , शांख्य , लिखित , दक्ष ,
शातातप , वशिष्ठ !

Friday, March 2, 2012

What is your nature(स्वभाव)? Swine like or Swan like? (FB)

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What is your nature(स्वभाव)? Swine like or Swan like?
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... Some people have swine tendency of interacting with environment. Like swine, they cannot distinguish between mud and matter of concern and intake everything. They read everything. They watch everything. They talk on everything. Good, bad, grotesque – don’t matter to them. Perceptions created by muddy inputs – don’t matter to them. They love to remain chaos and diseased state. Mutations are normal conditions for them.

Strikingly different, unlike swine, some have Swan tendency. They are skilled in identifying pollutants and stay away from pollutants. They remain in company of good. They ignore bad. They have discrimination power.

**How do you eat? Like swine (Fast food, trite food) or swan (Satvik ,pure, fresh and nutritive food, irrespective of tastes)?

**How do you breathe? Like swine (irregular, unscientific) or like Swan (Rhythmic, scientific, accordance with nature of respiratory system)

**What do read? Like swine (anything, junk newspapers, gossip crap on page 3) or like swan (editorials, research papers)?

**What do you watch? Like swine (anything and everything that comes on channels, Cricket (or Football) or like Swan (Selective, helpful, light entertainment which cannot carry your mind out after watching)?

Intake determines perceptions. Enquire before intake. Like swan, unlike swine.


An endless science, as we know, is grammar.
And life is short; the hindrances are many.
Essentials keep, leaving the non-essential,
As swans drink up the milk, but leave the water
-पंचतंत्र

" By him who is free from passion what is to be left [i. e. Nature] is left, and what is to be taken [i. e. Soul] is taken; as in the case of the swan and the milk."'
- Samkhya aphorism

"Others see not the difference when water is mixed with milk, but the
swan at once separates the milk and the water; so too when the
souls are absorbed in the supreme Brahman, the Lord,-the faithful,
who have received the Guru's words, can at once draw a difference between them."
-Tattva Muktavali

श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेत: तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीर: |
श्रेयो हि धीरोभिप्रेयसो वॄणीते प्रेयो मन्दो षोगक्षेमाद् वॄणीते ||
-कठ उपनिषद्

Both the good (Shreyas) and the pleasant (Preyas) approch the man. The wise man pondering over them, makes his choice. The wise(Swan) chooses the good (Shreyas) in preference to the pleasant (Preyas). The fool (simple-minded swine) for the sake of worldly-being prefers the pleasant (preyas)
-Katha Upanishad

This is the reason; iconography of Maa Saraswati – goddess of knowledge – is not completed without swan – the discriminative ability described by Bhagwad Gita.

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The aquatic bird swan lives on lakes that abound in lotuses, and subsists in a measure upon the underground stalk of the lotus plant (such a stalk is called bisa), whose joint (granthi), when crushed (bhagna), exudes a juice designated by the word ksira, which is also a common name for milk. Thus the bird, as it floats on the lake, may be said to drink ksira or milk out of water.

Real purpose of LIfe!

प्यारे मित्रों आदमी अपने आप को नहीं जानता इसलिए ,आखोवाला अंधा है ,टटोल टटोल कर दूसरों के बनाये मार्ग पर चल रहा है उसका कोई निजी अनुभव धर्म के मार्ग में नहीं है ,उसकी जीबन धारा बाहर की तरफ ही बह रही है ,उसकी सारी इन्द्रियाँ बाहर का मार्ग बताती है ,बह सब कुछ बाहर ही खोजता है ,धन ,पदार्थ ,सुख , काम ,धर्म ,बाहर के मूर्छा में उसे अपने अंदर मोजूद परमात्मा का कुछ अता-पता नहीं है ,शान्ती भी बाहर खोजता है ...मृगतृष्णा की तरह ,आनद भी बाहर खोजता है जैसे कुत्ते को सूखी हड्डी चबाने में आनंद मिलता है जबकि उसके मसूड़े से आने बाला खून उसे हड्डी से आता लगता है ,अच्छे अच्छे बिद्बन भी इस माया से सम्मोहित है ,पूरा जीबन ख्याति ,प्रतिस्ठा पाने मै खो देते है अपने आप को पा ही नहीं पाते ,और तो और आपने आपको पाना भी कुछ है ये भी नहीं जानते . बाहर का बहाव संसार है चाहे आप कुछ भी करे ,माया है ,अंदर की यात्रा धर्म है ,जो आपको अशान्त करे बह अधरर्म है ,जो शांती दे बो धर्म है नशे की शांती नही, गहरी बात है हल्के से मत लेना ,बाहर कुछ करना तो बहुत सरल है कृत्य सदा सरल है अंदर अकृत्य मै ठहरना कठिन है ,जिसको आप जीबन मान बैठे हो बो तो जीबन का अधिस्ठआन है जीबन का आधार तो जाना ही नहीं बही धर्म है ,क्योकि बह आपको धारण करता है ,समस्त धर्म बाहर धकेल रहे है इसलिए आदमी धर्म के आधार से बंचित है अन्जान है ,मै उसी आधार से अपने मित्रों को मिलाना चाहता हूँ परिचित करना चाहता हूँ जिससे मिलकर आप शांत आनंदित प्रसन्न हो कर जीबन जी सकते है ,इसे जागरण तो नहीं पर जागरण के बहुत निकट की अबस्था कहा जासकता है ,और अगर मेरे कोई मित्र जग जाये तो क्या बात है आनंद ही आनंद

स्वामी सच्चिदानंद परमहंस

Vaidic Kaal Gadana (Time Calculation)

हिन्दू धर्म के अनुसार सृष्टिकर्ता ब्रह्मा होते हैं। इनकी आयु इन्हीं के सौ वर्षों के बराबर होती है। इनकी आयु १००० महायुगों के बराबर होती है। विष्णु पुराण के अनुसार काल-गणना विभाग, विष्णु पुराण भाग १, तॄतीय अध्याय
के अनुसार:

2 अयन (छः मास अवधि, ऊपर देखें) = 360 मानव वर्ष = एक दिव्य वर्ष
4,000 + 400 + 400 = 4,800 दिव्य वर्ष = 1 कॄत युग
3,000 + 300 + 300 = 3,600 दिव्य वर्ष = 1 त्रेता युग
2,000 + 200 + 200 = 2,400 दिव्य वर्ष = 1 द्वापर युग
1,000 + 100 + 100 = 1,200 दिव्य वर्ष = 1 कलि युग
12,000 दिव्य वर्ष = 4 युग = 1 महायुग (दिव्य युग भी कहते हैं)

ब्रह्मा की काल गणना

1000 महायुग= 1 कल्प = ब्रह्मा का 1 दिवस (केवल दिन) (चार खरब बत्तीस अरब मानव वर्ष; और यहू सूर्य की खगोलीय वैज्ञानिक आयु भी है).

(दो कल्प ब्रह्मा के एक दिन और रात बनाते हैं)

30 ब्रह्मा के दिन = 1 ब्रह्मा का मास (दो खरब 59 अरब 20 करोड़ मानव वर्ष)
12 ब्रह्मा के मास = 1 ब्रह्मा के वर्ष (31 खरब 10 अरब 4 करोड़ मानव वर्ष)
50 ब्रह्मा के वर्ष = 1 परार्ध
2 परार्ध= 100 ब्रह्मा के वर्ष= 1 महाकल्प (ब्रह्मा का जीवन काल)(31 शंख 10 खरब 40अरब मानव वर्ष)

ब्रह्मा का एक दिवस 10,000 भागों में बंटा होता है, जिसे चरण कहते हैं:
चारों युग 4 चरण (1,728,000 सौर वर्ष) सत युग
3 चरण (1,296,000 सौर वर्ष) त्रेता युग
2 चरण (864,000 सौर वर्ष) द्वापर युग
1 चरण (432,000 सौर वर्ष) कलि युग

यह चक्र ऐसे दोहराता रहता है, कि ब्रह्मा के एक दिवस में 1000 महायुग हो जाते हैं

एक उपरोक्त युगों का चक्र = एक महायुग (43 लाख 20 हजार सौर वर्ष)
श्रीमद्भग्वदगीता के अनुसार "सहस्र-युग अहर-यद ब्रह्मणो विदुः", अर्थात ब्रह्मा का एक दिवस = 1000 महायुग. इसके अनुसार ब्रह्मा का एक दिवस = 4 अरब 32 खरब सौर वर्ष. इसी प्रकार इतनी ही अवधि ब्रह्मा की रात्रि की भी है.
एक मन्वन्तर में 71 महायुग (306,720,000 सौर वर्ष) होते हैं. प्रत्येक मन्वन्तर के शासक एक मनु होते हैं.
प्रत्येक मन्वन्तर के बाद, एक संधि-काल होता है, जो कि कॄतयुग के बराबर का होता है (1,728,000 = 4 चरण) (इस संधि-काल में प्रलय होने से पूर्ण पॄथ्वी जलमग्न हो जाती है.)
एक कल्प में 1,728,000 सौर वर्ष होते हैं, जिसे आदि संधि कहते हैं, जिसके बाद 14 मन्वन्तर और संधि काल आते हैं

ब्रह्मा का एक दिन बराबर है:

(14 गुणा 71 महायुग) + (15 x 4 चरण)

= 994 महायुग + (60 चरण)

= 994 महायुग + (6 x 10) चरण

= 994 महायुग + 6 महायुग

Thursday, March 1, 2012

The Two Dimensions Of Being A Detached Observer (FB)

The Two Dimensions Of Being A Detached Observer

There are two dimensions of being a detached observer - the inner dimension and the outer one.

Let us look at the inner dimension of detached observation. It is the ability or the technique to stand back from or observe in a detached way our own thoughts, feelings, emotions, attitudes and behavior. We are creators and our thoughts, feelings, emotions and attitudes are our creation. In fact, this is the first step to becoming a ruler of the self and making the self powerful. If we fail to detach from our thoughts and emotions then they will be our masters, they will go out of control and will, as a result, leak away or waste our energy. Practice simply being the witness of whatever you are thinking and feeling. This is an important aspect ...of any good spiritual practice and after a while you will find it an experience that both, frees you and empowers you.

The external dimension of detached observation is the technique of being a witness to or an observer of the scenes, of the world around us. As we stand back and watch the scenes of life being played, on the world stage around us, without being actively involved, we can see the 'big picture' more clearly. This makes it easier to judge clearly what is the most suitable contribution that we can make and the most suitable role we can play - through our thoughts, words and actions.

Wednesday, February 29, 2012

Geeta par Bhashyon ki soochi

गीता पर भाष्य

संस्कृत साहित्य की परम्परा में उन ग्रन्थों को भाष्य (शाब्दिक अर्थ - व्याख्या के योग्य), कहते हैं जो दूसरे ग्रन्थों के अर्थ की वृहद व्याख्या या टीका प्रस्तुत करते हैं। भारतीय दार्शनिक परंपरा में किसी भी नये दर्शन को या किसी दर्शन के नये स्वरूप को जड़ जमाने के लिए जिन तीन ग्रन्थों पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करना पड़ता था (अर्थात् भाष्य लिखकर) उनमें भगवद्गीता भी एक है (अन्य दो हैं- उपनिष...द् तथा ब्रह्मसूत्र)।
भगवद्गीता पर लिखे गये प्रमुख भाष्य निम्नानुसार हैं-
गीताभाष्य - आदि शंकराचार्य
ज्ञानेश्वरी - ज्ञानेश्वर महाराज ने संस्कृत से गीता का मराठी में अनुवाद किया ।
श्रीमद् भगवद् गीता यथारूप-प्रभुपाद
गीतारहस्य - बालगंगाधर तिलक
अनासक्ति योग - महात्मा गांधी
(Essays on Gita) - अरविन्द घोष
गीताई - विनोबा भावे
गीता तत्व विवेचनी - जयदयाल गोयन्दका
BhagvadGita As It Is-स्वामी प्रभुपाद (इस्कोन के संस्थापक)

Tuesday, February 28, 2012

FB post about Kasauti to accept/reject any thing

*****बुद्ध;- " हे कलामों , किसी बात को केवल इसलिए मत मानो की वह तूम्हारे सुनने में आई है , किसी बात को केवल ईसलिए मत मानो कि वह परंपरा से चली आई है -आप दादा के जमाने से चली आई है , किस...ि बात को केवल इसलिए मत मानो की वह धर्म ग्रंथो में लिखी हुई है , किसी बात को केवल इसलिए मत मानो की वह न्याय शास्त्र के अनुसार है किसी बात को केवल इसलिए मत मानो की उपरी तौर पर वह मान्य प्रतीत होती है , किसि बात को केवल इसलिए मत मानो कि वह हमारे विश्वास या हमारी दृष्टी के अनुकूल लागती है ,किसि बात को इसलिए मत मनो की उपरी तौर पर सच्ची प्रतीत होती है किसी बात को इसलिए मत मानो की वह किसी आदरणीय आचार्य द्वारा कही गई है . कालामों ;- फिर हमें क्या करना चाहिए .......????

बुद्ध ;- .....कलामो , कसौटी यही है की स्वयं अपने से प्रश्न करो कि क्या ये बात को स्वीकार करना हितकर है .....???? क्या यह बात करना निंदनीय है ...??? क्या यह बात बुद्धिमानों द्वारा निषिद्ध है , क्या इस बात से कष्ट अथवा दुःख ; होता है कलमों, इतना ही नही तूम्हे यह भी देखना चाहिए कि क्या यह मत तृष्णा, घृणा ,मूढता ,और द्वेष की भावना की वृद्धि में सहायक तो नही है , कालामों, यह भी देखना चाहिए कि कोई मत -विशेष किसी को उनकी अपनी इन्द्रियों का गुलाम तो नही बनाता, उसे हिंसा में प्रवृत्त तो नही करता , उसे चोरी करने को प्रेरित तो नही करता , अंत में तुम्हे यह देखना चाहिए कि यह दुःख ; के लिए या अहित के लिए तो नही है , इन सब बातो को अपनी बुद्धि से जांचो, परखो और तूम्हे स्वीकार करने लायक लगे , तो ही इसे अपनाओ ..........!!!!!

Sunday, February 26, 2012

Hamari sthiti: Vivekanand Ji ki ek Kahani ke dwara

स्वामी विवेकानद जी एक कहानी अपने प्रवचनों में सुनाया करते थे !

एक गडरिये को जंगल में शेर का नवजात बच्चा मिला, जिसकी आंख भी नहीं खुली थी ! मां संभवतः किसी शिकारी के हाथों मारी गई थी ! गडरिया दया करके उस बच्चे को अपने साथ ले आया तथा बकरियों का दूध पिलाकर उसे पालने लगा ! बच्चा बड़ा हुआ ! बह स्वयं को बकरी ही समझने लगा ! उनके साथ धक्के खाता हुआ झुण्ड में चलता ! बाड़े के बाहर कुत्तों से डरता तथा गडरिये को अपना मालिक समझता तथा उसकी लाठी से भयभीत होता ! एक दिन जंगल के शेर ने उसकी यह हालत देखी तो उसे बहुत अचम्भा हुआ ! उसने उसे पकड़ने का प्रयत्न किया किन्तु स्वयं को बकरी समझने बाला यह शेर बचने को भागा ! जैसे तैसे जंगल के शेर ने उसे पकड़ा और कहा कि तू कैसा शेर है जो बकरी बना हुआ है ! उसने जबाब दिया कि हे जंगल के राजा आपसे किसी ने झूठ शिकायत कर दी है, मैं कोई शेर बेर नहीं हूँ ! मैं तो गरीब बकरी ही हूँ ! तब शेर कान पकड़कर उसे एक कुए के पास ले गया वा उसके निर्मल जल में परछाईं दिखाई ! कि देख यह मैं हूँ और यह तू है ! हम दोनों एक जैसे हैं अथवा नहीं ? यदि मैं शेर हूँ तो तू भी तो शेर है ! ज़रा गर्जना तो कर के देख ! अभी तुझे समझ आ जाएगा ! और जैसे ही आत्म विस्मृत शेर ने दहाड़ लगाई, उसे तो उसे सारी कायनात को मालूम हो गया कि जंगल में एक नया शेर आ गया है ! जो बकरियां अब तक उसे धकिया देती थी, वे उसके सामने से गायब हो गईं और जिन कुत्तों के भोंकने से बह थर थर कांपने लगता था वे कुत्ते उसके सामने से दुम दबाकर भाग छूटे !

Saturday, February 25, 2012

Fact Archeive : Social

Yoga has truly taken America by storm. It has become a six billion dollar industry! continues to grow with an ever-growing value in the medical community. Many doctors and therapists are now recommending Yoga more and more to their patients. Shri Swami Vivekananda with his charismatic brilliance to show the concept in a simple and positive outlook introduced it to America for the first time.

स्वामी विवेकानंद जी -३९ वर्ष; आदि शंकराचार्य जी -३२ वर्ष

Link : Pride

Mrs. Zelia Nuttal (1857 -1933) Archaeologist and ethnologist on 'the exposition of the pyramidal cross in India':
1. http://www.facebook.com/photo.php?fbid=325593894125217&set=a.137124559638819.19666.137122792972329&type=3
2. http://books.google.co.uk/books?id=XVnoWg01l3AC&pg=PA516&dq=Zelia+Nuttal+India+Bidh+OR+Madhu&hl=en&sa=X&ei=2eJIT-fpMYjS8QO9q8GvDg&ved=0CDUQ6AEwAA#v=onepage&q&f=false

Hindu Rashtra:
http://a4.sphotos.ak.fbcdn.net/hphotos-ak-ash4/s320x320/432179_162603317191248_100003247430926_224666_2055305911_n.jpg

Link : Glorious Aryan Existence with Bharat as capital or Influence

+ive:

INDIA-THE MOTHER OF NATIONS (Mr Chaman Lal, UNIVERSITY OF ILLINOIS AT URBANA-CHAMPAIGN):
http://brittlebooks.library.illinois.edu/brittlebooks_closed/Books2011-11/LALCHA0001HINAME/LALCHA0001HINAME_ocr.txt
[My special perspective: This is a Link in chain revealing it was all Bharat before Christianity and Islam]

Ancient Idol of Lord Vishnu found during excavation in an old village in Russia:
http://www.facebook.com/#!/photo.php?fbid=366734963344443&set=a.137124559638819.19666.137122792972329&type=3&theater

My Son: A Holy Land Of Hinduism: ancient monumental treasure in Vietnam.:
http://www.facebook.com/#!/photo.php?fbid=344852638866009&set=a.137124559638819.19666.137122792972329&type=3&theater

There was Ram:
http://chandrakantmarwadi.com/there-was-ram/chapter-10-capisa-the-gate-way-of-india/

Sunday, February 19, 2012

Muslim Attitude vs Hindu -1

जरा फ़िर सोचिये और स्वयं के लिये इन प्रश्नों के उत्तर खोजिये.....

१. विश्व में लगभग ५२ मुस्लिम देश हैं, एक मुस्लिम देश का नाम बताईये जो हज के लिये "सब्सिडी" देता हो ?

२. एक मुस्लिम देश बताईये जहाँ हिन्दुओं के लिये विशेष कानून हैं, जैसे कि ...भारत में मुसलमानों के लिये हैं ?

३. किसी एक देश का नाम बताईये, जहाँ ८५% बहुसंख्यकों को "याचना" करनी पडती है, १५% अल्पसंख्यकों को संतुष्ट करने के लिये ?

४. ...एक मुस्लिम देश का नाम बताईये, जहाँ का राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री गैर-मुस्लिम हो ?

५. किसी "मुल्ला" या "मौलवी" का नाम बताईये, जिसने आतंकवादियों के खिलाफ़ फ़तवा जारी कियाहो ?

६. महाराष्ट्र, बिहार, केरल जैसे हिन्दू बहुल राज्यों में मुस्लिम मुख्यमन्त्री हो चुके हैं, क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि मुस्लिम बहुल राज्य "कश्मीर" में कोई हिन्दू मुख्यमन्त्री हो सकता है ?

७. १९४७ में आजादी के दौरान पाकिस्तान में हिन्दू जनसंख्या 24% थी, अब वह घटकर 1% रह गई है, उसी समय तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब आज का अहसानफ़रामोश बांग्लादेश) में हिन्दू जनसंख्या 30% थी जो अब 7% से भी कम हो गई है । क्या हुआ गुमशुदा हिन्दुओं का ? क्या वहाँ (और यहाँ भी) हिन्दुओं के कोई मानवाधिकार हैं ?

८. जबकि इस दौरान भारत में मुस्लिम जनसंख्या10.4% से बढकर 14.2% हो गई है, क्या वाकई हिन्दू कट्टरवादी हैं ?

९. यदि हिन्दू असहिष्णु हैं तो कैसे हमारे यहाँ मुस्लिम सडकों पर,लाऊडस्पीकर पर दिन भर नमाज पढते रहते हैं?

१०. सोमनाथ मन्दिर के जीर्णोद्धार के लिये देश के पैसे का दुरुपयोग नहीं होना चाहिये ऐसा गाँधीजी ने कहा था, लेकिन 1948 में ही दिल्ली की मस्जिदों को सरकारी मदद से बनवाने के लिये उन्होंने नेहरू और पटेल पर दबाव बनाया, क्यों ?

११. कश्मीर, नागालैण्ड, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय आदि में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं, क्या उन्हें कोई विशेष सुविधा मिलती है ?

१२. हज करने के लिये सबसिडी मिलती है, जबकि मानसरोवर और अमरनाथ जाने पर टैक्स देना पड़ता है, क्यों ?

१३. मदरसे और क्रिश्चियन स्कूल अपने-अपने स्कूलों में बाईबल और कुरान पढा सकते हैं, तो फ़िर सरस्वती शिशु मन्दिरों में और बाकी स्कूलों में गीता और रामायण क्यों नहीं पढाई जा सकती ?

१४. गोधरा के बाद मीडिया में जो हंगामा बरपा,वैसा हंगामा कश्मीर के चार लाख हिन्दुओं की मौत और पलायन पर क्यों नहीं होता ?
वंदे मातरम

Saturday, February 18, 2012

Dharma is wrongly translated as Religion

क्या धर्म का मतलब रिलिजन (religion) होता है ......देखते हैं .....
रिलिजन = री + लिगेयर से बना है जो लैटिन शब्द है जिसमे लिगेयर का मतलब बांधना होता है == पुनः+बंधन ( पुस्तक आधारित धर्मों में किसी विशेष पुस्तक या व्यक्ति के साथ जुड़ने के लिए ऐसे शब्द प्रयोग किये जाते थे ) bible and christ

धर्म = संस्कृत के धी धातु से बना है जिसका अर्थ धारण करना है (Dhi: The mind's ability to learn or acquire ) ...eg. भर्गो देवस्यधिमही
गीता में भगवन कृष्ण "धारणात धर्मः "....हमारा मन ,मष्तिस्क ,ह्रदय , आत्मा ,चिंतन और विचार जिस तथ्य को स्वतंत्रता से धारण करे वही धर्म है ....कर्त्तव्य बोध के साथ .....
राजा दिलीप का गौ की प्राणरक्षा के लिए प्राण के बलिदान का निर्णय धर्म था
महर्षि दधिची का अस्थिदान धर्मं था
भगवान राम का पिता का आदेश पालन धर्मं था
अर्जुन का युद्ध धर्मं था
शिवाजी का विजय अभियान धर्मं था
मंगल पाण्डेय का बलिदान धर्मं था
वीर सावरकर का और नेता जी का त्याग धर्मं था
और आज सामाजिक उत्थान और सम्यक धर्मं निर्देशन मेरा धर्मं है
क्या सबरी, अजामिल, निषाद राज और जटायु ने कोई एक किताब या कोई व्यक्ति को ही फालो किया था क्या ...........बाकि किताबी धर्मों की तरह ....
शबरी ने नवधा भक्ति का सृजन कर दिया ..........
हिन्दू धर्म एक प्री डीफाइन सोफ्टवेयर नहीं है जो बदलाव न स्वीकार कर सके बल्कि एक स्वतः स्फूर्त मेधावी ऑपरेटिंग सिस्टम विथ ऑटो अपडेटेड प्लगइन है जो समय समय पर अपडेट होता रहता है .......
निराकार ब्रह्म से शिव
शिव से शंकर
शंकर से राम
राम से कृष्ण
कृष्ण से ......भक्ति,भाव,ज्ञान......की ज्ञान गंगा
christianity!!! plz stop ur network marketing from "bharat" ....just bugger off 4m here
धन्यवाद

हिन्दू ब्रह्माण्डीय समय चक्र सूर्य सिद्धांत

हिन्दू ब्रह्माण्डीय समय चक्र सूर्य सिद्धांत के पहले अध्याय के श्लोक 11–23 में आते हैं.[1]:

"(श्लोक 11). वह जो कि श्वास (प्राण) से आरम्भ होता है, यथार्थ कहलाता है; और वह जो त्रुटि से आरम्भ होता है, अवास्तविक कहलाता है. छः श्वास से एक विनाड़...ी बनती है. साठ श्वासों से एक नाड़ी बनती है.

(12). और साठ नाड़ियों से एक दिवस (दिन और रात्रि) बनते हैं. तीस दिवसों से एक मास (महीना) बनता है. एक नागरिक (सावन...) मास सूर्योदयों की संख्याओं के बराबर होता है.

(13). एक चंद्र मास, उतनी चंद्र तिथियों से बनता है. एक सौर मास सूर्य के राशि में प्रवेश से निश्चित होता है. बारह मास एक वरष बनाते हैं. एक वरष को देवताओं का एक दिवस कहते हैं.

(14). देवताओं और दैत्यों के दिन और रात्रि पारस्परिक उलटे होते हैं. उनके छः गुणा साठ देवताओं के (दिव्य) वर्ष होते हैं. ऐसे ही दैत्यों के भी होते हैं.

(15). बारह सहस्र (हज़ार) दिव्य वर्षों को एक चतुर्युग कहते हैं. यह चार लाख बत्तीस हज़ार सौर वर्षों का होता है.

(16) चतुर्युगी की उषा और संध्या काल होते हैं। कॄतयुग या सतयुग और अन्य युगों का अन्तर, जैसे मापा जाता है, वह इस प्रकार है, जो कि चरणों में होता है:

(17). एक चतुर्युगी का दशांश को क्रमशः चार, तीन, दो और एक से गुणा करने पर कॄतयुग और अन्य युगों की अवधि मिलती है. इन सभी का छठा भाग इनकी उषा और संध्या होता है.

(18). इकहत्तर चतुर्युगी एक मन्वन्तर या एक मनु की आयु होते हैं. इसके अन्त पर संध्या होती है, जिसकी अवधि एक सतयुग के बराबर होती है, और यह प्रलय होती है. (19). एक कल्प में चौदह मन्वन्तर होते हैं, अपनी संध्याओं के साथ; प्रत्येक कल्प के आरम्भ में पंद्रहवीं संध्या/उषा होती है. यह भी सतयुग के बराबर ही होती है।

(20). एक कल्प में, एक हज़ार चतुर्युगी होते हैं, और फ़िर एक प्रलय होती है. यह ब्रह्मा का एक दिन होता है. इसके बाद इतनी ही लम्बी रात्रि भी होती है.

(21). इस दिन और रात्रि के आकलन से उनकी आयु एक सौ वर्ष होती है; उनकी आधी आयु निकल चुकी है, और शेष में से यह प्रथम कल्प है.

(22). इस कल्प में, छः मनु अपनी संध्याओं समेत निकल चुके, अब सातवें मनु (वैवस्वत: विवस्वान (सूर्य) के पुत्र) का सत्तैसवां चतुर्युगी बीत चुका है.

(23). वर्तमान में, अट्ठाईसवां चतुर्युगी का कॄतयुग बीत चुका है. उस बिन्दु से समय का आकलन किया जाता है.

Tuesday, February 14, 2012

Importance of Guru for Bhagwadprapti and Story of Prachetas

बिना सद् गुरु के परमात्मा प्राप्ति असंभव है! उनके बिन साकार रूप मे जैसे आप कि धारण हो वैसे दर्शन तो हो सकते हैं लेकिन प्राप्ति नही| साकार रूप तो दर्शन दे कर वापस निराकार तत्त्व में विलीन हो जाएगा| वास्तव में भगवान किसी विशेष तरह के और जगह पे नहीं हैं! मैं आप को कैसे समझाउं| शब्दों में और बुद्धि के द्वारा संभव नहीं| बस ये समझ लीजिये की जो है सो है| अद्भुद बात तो ये है की मनुष्य में वो क्षमता है की इस ऊँची से ऊँची और गूढ़ से गूढ़ बात का अनुभव पा सकता है वो भी अपने ही अन्दर| आप का जीवन गुण उसी की उपस्थिति का परिणाम है !! वो आप के इतना पास है! जितना पास आप अपने 'मैं' का अनुभव करते हैं! अरे वो अनुभव उसी की उपस्थिति से ही तो है| जिस दिन जिस क्षण आप अपने होने का अनुभव न हो उसी दिन उसी क्षण परमात्मा आप से दूर है ( ऐसा कभी हो सकता है क्या :) .. मृत्यु के बाद भी आप को रंच मात्र संशय नहीं होता की मैं हूँ की नहीं..)| ऐसे की प्राप्ति अपनी ही बेवकूफी से कठिन हो जाती है| वो बेवकूफी क्या है और कैसे दूर होगी.. आत्मसाक्षात्कारी गुरु ही समझ सकता है| जैसे न्यायालय में वकील, शल्य क्रिया में डॉक्टर के बिना कुछ नहीं.. वैसे ही ये गुरु का है ... वहा तो फिर भी काम चल जाए उनके बिना ....

ठीक आप के प्रश्न का एकदम सटीक उत्तर हमारे पुराण एक घटना के द्वारा देते हैं| आदि काल एक राजा (नाम नहीं याद आ रहा) के १० पुत्र हुए जिन्हें प्रचेता बोला जाता था| राजा ने चिर कल के शाशन के बाद पाया की इस जगत में कुछ सार है नहीं| सालों तक भव्यतम राजसी सुख भोगने के बाद भी मांग वही की वही| तब राजा ने प्रचेताओं को बुला के कहा की राज काज में भी वास्तविक सुख नहीं| मैं राज्य के १० भाग कर के तुम को दे के कल वानप्रस्थ गमन करूँगा और गुरु की खोज करूँगा| प्रचेताओं ने विचार किया की " पिता जी इतने बुद्धि मान और प्रतापी हैं| कभी निरर्थक नहीं बोलते| और वो इस जैसे राज्य को छोड़ कर वन जाने की बात करते हैं! जो उन्हें निरर्थक लग रही है अब वो हमें क्या सार्थक लगेगी कभी! इससे पहले की कल इस चक्कर में पड़े, हम आज ही निकल लेते हैं रात को वास्तविक अर्थ की खोज में|" ऐसा कर के वो रात में ही निकल पड़े| लेकिन करे क्या अब ? तो विचार कर भगवान शिव की सच्ची तपस्या की| श्री शिव जी आये तो मार्गदर्शन माँगा की जीवन की वास्तविकता क्या है और कैसे मिलेगी? शिव जी ने भगवन नारायण का मंत्र दिया और बोला की वही इसका उत्तर देंगे| नारायण तपस्या| श्री विष्णु जी आये| उन्होंने कुछ भी मांगने को कहा| प्रचेताओं ने विचार कर कहा की "हम खुद मांगेंगे तो अपनी बुद्धि से मांगेंगे| बच्चा अपनी उतनी भलाई नहीं समझा सकता जितनी माँ| अतः आप वही दे जिसमें हमारा वास्तविक भला है|" विष्णु जी इस

Monday, February 13, 2012

REAL VIJAY STAMBH ~ THE FALSE KUTUB MINAR

http://www.facebook.com/media/set/?set=a.131288093590797.31090.100001288223976&type=3

http://www.youtube.com/watch?v=4xC3X8Oe5ek


The complex is supposed to be built by the Greatest of Hindu emperors there was MaharajaDhiraj Vikramaditya of Ujjaini , brother of Bharathiri the Kind and Philosopher and originator of Bharathari neeti shataka . The tower is known to have been errected to celebrate the victory of the Great Emperor Vikramaditya , over the lands now called as Arab lands . They have known to celebrate the coming of the vedic way of life .

Vedic culture was very much alive just before the birth of Muhammad. Again let's refer to the Sair-Ul-Okul. The following poem was written by Jirrham Bintoi who lived 165 years before the prophet Muhammed. It is in praise of India's great King Vikramaditya who had lived 500 years before Bintoi.

"Itrasshaphai Santul
Bikramatul phehalameen Karimun
Bihillahaya Samiminela
Motakabbenaran Bihillaha
Yubee qaid min howa
Yaphakharu phajgal asari
nahans Osirim Bayjayholeen
Yaha sabdunya Kanateph natephi
bijihalin Atadari Bilala masaurateen
phakef Tasabahu. Kaunni eja majakaralhada
walhada Achimiman, burukan, Kad, Toluho
watastaru Bihillaha yakajibainana baleykulle amarena
Phaheya jaunabil amaray Bikramatoon" - (Sair-ul-Okul, Page 315)

"Fortunate are those who were born during King Vikram's reign, he was a noble generous, dutiful ruler devoted to the welfare of his subjects. But at that time, We Arabs oblivious of divinity were lost in sensual pleasures. Plotting & torture were rampant. The darkness of ignorance had enveloped our country. Like the lamb struggling for its life in the cruel jaws of a wolf, we Arabs were gripped by ignorance. The whole country was enveloped in a darkness as intense as on a New moon night. But the present dawn & pleasant sunshine of education is the result of the favor of that noble king Vikram whose benevolence did not lose sight of us foreigners as we were. He spread his sacred culture amongst us and sent scholars from his own land whose brilliance shone like that of the sun in our country. These scholars & preceptors through whose benevolence we were once again made aware of the presence of god, introduced to his secret knowledge & put on the road to truth, had come to our country to initiate us in that culture & impart education."

Thus we can see that Vedic religion and culture were present in Pre-Islamic Arabia as early as 1850 B.C., and definitely present at the time of Mohammed's birth.

According to history, the minar was started by Prithviraj or his uncle Vigraharaja who won Delhi from the Tomar Rajputs. However, it is assumed by secularist and anti hindu historians that Qutubuddib and Iltutmish finished it though the pictures will clearly show that the tower may have been commenced by Prithviraj or Vigraharaja.

Anang Pal,the Tomar Rajput King , established Delhi and Lal Kot,which is the area of Kutub Minar and extends up to Lal Quila ,or the demarcation line of old Delhi.In olden days fortresses used to be built at the entrance of a state and the present delineation of Delhi borders extended from South area of Qutub Minar to Red Quila in North Delhi.

The Tomars were descendents of the great Vikramaditya ,who had initially established the Iron Pillar at Vishnupadagiri (meaning “hill with footprint of Vishnu”). This place has been identified as modern Udayagiri, situated in the close vicinity of Besnagar, Vidisha and Sanchi. These towns are located about 50 kilometres east of Bhopal, in central India. There are several aspects to the original erection site of the pillar at Udayagiri. It must be worth noting that Vishnupadagiri is located on the Tropic of Cancer and, therefore, was a centre of astronomical studies during the Gupta period.

The Iron Pillar served an important astronomical function, when it was originally at Vishnupadagiri. The early morning shadow of the Iron Pillar fell in the direction of the foot of Anantasayain Vishnu (in one of the panels at Udayagiri) only in the time around summer solstice (June 21). The creation and development of the Udayagiri site appears to have been clearly guided by a highly developed astronomical knowledge. Therefore, the Udayagiri site, in general, and the Iron Pillar location in particular, provide firm evidence for the astronomical knowledge that existed in ancient India around 400 AD..The pillar was then believed to have been moved to Mathura.

Dhillika is the old name of India's capital, New Delhi. The name Delhi is derived from the word 'Dhillika'. Raja Dhilu (King Dihlu) founded ancient Delhi in 800 BC.It was the name of the first medieval township of Delhi, located on the southwestern border of the present Delhi, in Mehrauli. This was the first in the series of seven medieval cities. It is also known as Yoginipura, that is, the fortress of the yoginis (female divinities). A temple still exists at the entrance of Mehrauli called YOG MAYA TEMPLE. Mehrauli comes from Sanskrit word Mihira-awali. It signifies the town- ship where the well known astronomer Mihira of Vikramaditya's court lived along with his helpers, mathemati-cians and technicians.Delhi however gained in magnificence / importance during the time of Ananga Pala Tomara,in the 11th century. In the 12th century, the city was included in the dominions of Prithviraj Chauhan.

The Iron Pillar ,a symbol of Truth and Nemesis-God Shani of Hindu Religion was brought by Anang Pal of Tomar dynasty to Delhi to establish rule of Clean,truthful and honest governance,from Mathura a land of Krishna devotion.The idea behind it was to establish an orientation to the great epic Mahabharata which is connected to the history of Delhi as well as the significance of Gita,and Yudhishtra’s ascent to heaven in bodily form; from Swargya Rohini..The Hindu rulers built temples and used psychological epigraphs and monuments to instill religion in the local populace ,as they followed the pattern of the common man’s rule,or democratic ,socialist way of functioning as Krishnaji of the Yadav Clan.In China too the common man reigned supreme by the rule of Confucianism laying significance on ritualistic worship.The idea was not to punish after a crime was committed but to deter crime in man.

The Iron pillar bears an inscription in Sanskrit which states that it was erected as a standard in honour of the Hindu god, Vishnu. It also praises the valor and qualities of a king referred to simply as Chandra, who has been identified with the Gupta King Chandragupta II Vikramaditya (375-413). The inscription reads:

“ He, on whose arm fame was inscribed by the sword, when, in battle in the Vanga countries, he kneaded (and turned) back with (his) breast the enemies who, uniting together, came against (him);-he, by whom, having crossed in warfare the seven mouths of the (river) Sindhu, the Vâhlikas were conquered;-he, by the breezes of whose prowess the southern ocean is even still perfumed;-

(Line 3.)-He, the remnant of the great zeal of whose energy, which utterly destroyed (his) enemies, like (the remnant of the great glowing heat) of a burned-out fire in a great forest, even now leaves not the earth; though he, the king, as if wearied, has quitted this earth, and has gone to the other world, moving in (bodily) form to the land (of paradise) won by (the merit of his) actions, (but) remaining on (this) earth by (the memory of his) fame;-

(L. 5.)-By him, the king,-who attained sole supreme sovereignty in the world, acquired by his own arm and (enjoyed) for a very long time; (and) who, having the name of Chandra, carried a beauty of countenance like (the beauty of) the full-moon,-having in faith fixed his mind upon (the god) Vishnu, this lofty standard of the divine Vishnu was set up on the hill (called) Vishnupada.

The reference was also to the Satvikka Purana [Smirti Texts of Hinduism]called Garuda Purana which is recited as a cremation ritual.The Garuda atop the pillar ,which was removed by muslims,bore testimony to what was inscribed and its relevance to the installation of the pillar.The pillar was used to signify the death principle of Hindus,the need for attaining Mokhsha and the path of Dharma. The iron pillar was the Garud Dhwaj alias Garud Stambh, i.e, the sentinel post of the Vishnu temple. The Sanskrit inscription in Brahmi script on the non-rusting iron pillar proclaimed the lofty standards of Vishnu on Vishnupad Giri. Here in the said precincts ,the description indicates that a statue of the rec- lining Vishnu ;initiating the creation was consecrated in the central shrine there which was ravaged by Mohammad Ghori and his henchman Qutubuddin.

Wednesday, February 8, 2012

Christianity and Islam Cast division Vs Hindu Cast system for society

क्या आप जानते हैं कि......

********ईसाई धर्म में ......एक मसीह....एक बाइबल..... और एक ही धर्म है ... !

लेकिन मजे कि बात ये कि...
...
लैटिन कैथोलिक, सीरियाई कैथोलिक चर्च में प्रवेश नहीं करेगा.

ये दोनों, मर्थोमा चर्च में प्रवेश नहीं करेगा.

ये तीनों, Pentecost के चर्च में प्रवेश नहीं करेगा.

और, ये चारों... साल्वेशन आर्मी चर्च में प्रवेश नहीं करेगा.

इतना ही नहीं, ये पांचों, सातवें दिन Adventist चर्च में प्रवेश नहीं करेगा.

ये छह के छह, रूढ़िवादी चर्च में प्रवेश नहीं करेगा.

अब ये सातों जैकोबाइट चर्च में प्रवेश नहीं करेगा.

और, इसी तरह से........ ईसाई धर्म की 146 जातियां सिर्फ केरल में ही मौजूद हैं,

इतना शर्मनाक होने पर भी ये .... चिल्लाते रहेंगे कि.. एक मसीह, एक बाइबिल, एक धर्म(??)

******अब देखिए मुस्लिमों को ...

अल्लाह एक , एक कुरान, एक .... नबी ! और महान एकता......... बतलाते हैं ?

जबकि, मुसलमानों के बीच, शिया और सुन्नी सभी मुस्लिम देशों में एक दूसरे को मार रहे हैं .

और, अधिकांश मुस्लिम देशों में.... इन दो संप्रदायों के बीच हमेशा धार्मिक दंगा होता रहता है..!

इतना ही नहीं... शिया को.., सुन्नी मस्जिद में जाना मना है .

इन दोनों को.. अहमदिया मस्जिद में नहीं जाना है.

और, ये तीनों...... सूफी मस्जिद में कभी नहीं जाएँगे.

फिर, इन चारों का मुजाहिद्दीन मस्जिद में प्रवेश वर्जित है..!

और इसी प्रकार से मुस्लिमों में भी 13 तरह के मुस्लिम हैं., जो एक दुसरे के खून के प्यासे रहते हैं और आपस में बमबारी और मार-काट वगैरह... मचाते रहते हैं.

लेकिन, फिर भी.... भोले-भाले लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए ये दिन भर लाउडस्पीकर पर गला फाड़ -फाड़ कर चिल्लाते रहेंगे कि...

अल्लाह एक है., हमारा एक कुरान है , एक नबी है .... हम अच्छे है ... और ना जाने क्या अंट-शंट बोलते रहते हैं ???

*****अब आइये ... जरा हम अपने हिन्दू/सनातन धर्म को भी देखते हैं.

हमारी 1280 धार्मिक पुस्तकें हैं, जिसकी 10,000 से भी ज्यादा टिप्पणियां और १,00.000 से भी अधिक उप-टिप्पणियों मौजूद हैं..! एक भगवान के अनगिनत प्रस्तुतियों की विविधता, अनेकों आचार्य तथा हजारों ऋषि-मुनि हैं जिन्होंने अनेक भाषाओँ में उपदेश दिया है..

फिर भी, हम सभी मंदिरों में जाते हैं, इतना ही नहीं.. हम इतने शांतिपूर्ण और सहिष्णु लोग हैं कि सब लोग एक साथ मिलकर सभी मंदिरों और सभी भगवानो की पूजा करते हैं .

और तो और.... पिछले दस हजार साल में धर्म के नाम पर हिंदुओं में "कभी झगड़ा नहीं" हुआ .

इसलिए इन लोगों की नौटंकी और बहकावे पर मत जाओ... और.... "गर्व से कहो हम हिन्दू हैं"...!

जय महाकाल...!!!